पार्वती जी के आग्रह पर शिव मुदित होते हैं और कहते हैं तुम्हारे समान उपकारी कोई नहीं है। तुम राम जी का प्रसंग पूछकर सब लोको को पवित्र कर देने वाली गंगा के समान रामकथा का हेतु बनी हो। इस तरह शिव पार्वती संवाद के साथ मंच पर धीरे-धीरे रामकथा की भाव भूमि तैयार होनी शुरू हुई। वे माता पार्वती को रामजन्म का हेतु बताते हुए कहते हैं कि जब जब होई धरम कै हानि। बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी।। तब तब प्रभु धरि विविध शरीरा। हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा...।
हे पार्वती जब-जब धर्म की हानि होती है और नीच, अभिमानी असुर बढ़ जाते हैं तब कृपानिधि श्री हरि अनेक प्रकार का शरीर धारण कर भक्तों की पीड़ा हरते हैं।