गर्भाशय के संक्रमण से बच्चे को मानसिक रोग का खतरा रहता है। वहीं किशोरावस्था में अचानक व्यवहार बदल जाए तो बिना देरी किए मानसिक रोग विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए। यह मानसिक रोग स्किजोफ्रेनिया का लक्षण हो सकता है।
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इस बीमारी में रात में नींद न आना, उम्मीद के विपरीत बदलाव आना और सोचने-समझने की क्षमता खो देने जैसी समस्या होती है। यह जानकारी केजीएमयू के जीरियाट्रिक मेंटल हेल्थ के विभागाध्यक्ष और स्टेट मेंटल हेल्थ अथॉरिटी के सचिव प्रो. एससी तिवारी ने विश्व स्किजोफ्रेनिया-डे की पूर्व संध्या पर बुधवार को दी। उन्होंने बताया कि यह बीमारी 13 से 14 साल की उम्र से ही हो सकती है। 40 की उम्र के बाद यह बीमारी साइकोसिस के रूप में जानी जाती है।
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डाॅ एससी तिवारी
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अनुवांशिक नहीं है यह बीमारी : डॉ. एससी तिवारी ने बताया कि किसी के घर में कोई मानसिक रूप से बीमार है तो परिवार के अन्य लोगों में भी यह बीमारी होने की बात कही जाती है। लेकिन यह बीमारी किसी भी तरह से अनुवांशिक नहीं है।
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प्रो. एससी तिवारी ने बताया कि गर्भावस्था में गर्भाशय के संक्रमण, गर्भवती को लगातार बुखार या किसी भी तरह के वायरल इन्फेक्शन से भी होने वाले शिशु को मानसिक रोग का खतरा होता है। इसके अलावा गर्भ में या प्रसव के समय शिशु को चोट लगने से भी आगे जाकर उसे स्किजोफ्रेनिया की आशंका होती है।
स्किजोफ्रेनिया एक तरह की मानसिक बीमारी है। इसमें व्यक्ति को किस समय क्या करना है? कैसे करना चाहिए? दिमाग की सोचने-समझने की यह क्षमता कम हो जाती है। व्यक्ति अपने आस-पास हो रही घटनाओं को खुद से जोड़ नहीं पाता। वह उलूल-जुलूल बर्ताव करने लगता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक, कुल जनसंख्या के एक प्रतिशत लोग इस बीमारी से ग्रसित हैं। भारत में भी एक से दो प्रतिशत लोग इस बीमारी की चपेट में है।