जिंदगी की पहेली समझना मुश्किल है। जब यह नाराज होती है तो अपने पीछे गम और आंसू छोड़ जाती है। सुदामापुर गांव में भी यह हालात है। शिक्षक और उसके परिवार के जनाजे निकले तो हर आंख भर आई। 72 घंटों से गांव में मातम और उदासी पसरी हुई है। गोला घाट में भी जब शवों का अंतिम संस्कार हो रहा था तो गंगा तट के पास खड़ी जिंदगियां नियति के खेल के सारे सिर झुकाने को मजबूर हुईं। शायद यही जिंदगी का फलसफा है।
गंगा घाट के किनारे चार शवों को देख हर किसी के जेहन में जिंदगी की पहेली कौंध गई। एक पल के लिए लगा कि क्या यही सच है। उधर, सुदामापुर गांव इस तरह वीरान सा नजर आ रहा है कि जैसे गांव पर किसी क्रूर ने कहर बरपाया हो। लोग घरों से निकल नहीं रहे हैं। दिलों में चार शवों की याद इस कदर बस गई है कि उससे बाहर निकलने में लोगों को भी समय लगेगा।