लखनऊ के रायबरेली रोड पर स्थित उतरठिया से किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज की दूरी उस दिन पहाड़ लांघने सरीखी हो गई और तारा चंद्र यादव जब तक अपनी बीमार मां को लेकर अस्पताल पहुंचते उन्होंने रास्ते में ही दम तोड़ दिया।
उस दिन उन्हें अहसास हुआ कि अगर एंबुलेंस होती तो शायद उनकी मां को इलाज मिल जाता और डॉक्टर बचा लेते। पिता के रिटायर होने के बाद 2007 में उन्होंने सेकंड हैंड एंबुलेंस खरीदी और घायल व गंभीर बीमार लोगों को सरकारी अस्पताल तक पहुंचाने की नि:शुल्क सेवा शुरू कर दी।
तारा चंद्र अब तक 786 लोगों को अस्पताल पहुंचा चुके हैं। वह कहते हैं कि लोगों की जान बच जाती है तो मां को खोने का मलाल थोड़ा कम हो जाता है। महज इंटरमीडिएट तक शिक्षा हासिल करने वाले तारा चंद्र यादव यूं तो रायबरेली रोड पर मौजूद उस प्याऊ की वजह से भी पहचाने जाते हैं जो सरदार डेंटल कॉलेज के सामने पूरे साल भर लोगों की प्यास बुझाता है।
हर रोज इस प्याऊ पर ड्यूटी निभाने वाले तारा को इससे कहीं ज्यादा बड़ी पहचान मिली है उस एंबुलेंस सेवा से, जिसे वह पिछले 12 सालों से निस्वार्थ भाव से बगैर किसी व्यवधान के संचालित कर रहे हैं। 10 अक्तूबर 1987 को मां रामदुलारी ने मेडिकल कॉलेज पहुंचने से पहले उनका साथ छोड़ा। तब से एंबुलेंस सेवा शुरू करने की इच्छा मन में बनी रही।
एंबुलेंस खरीदने के लिए पैसे नहीं थे तो पिता पूर्णमासी यादव के सेना के इंजीनियरिंग कोर से रिटायर होने का इंतजार किया। उनके फंड से मिले पैसों की मदद से पौने दो लाख रुपये में सेकंड हैंड गाड़ी खरीदी। अब आस-पास की सभी पुलिस चौकियों, थानों और सार्वजनिक स्थलों पर उनका मोबाइल नंबर दर्ज है।
हादसा होने की सूचना मिलते ही वह एंबुलेंस लेकर वहां पहुंचते हैं और बगैर कोई शुल्क वसूल घायल को अस्पताल पहुंचा देते हैं। अब तक 786 लोगों को अस्पताल पहुंचा चुके हैं। मां दुलारी के नाम से ही एंबुलेंस का संचालन कर रहे ताराचंद्र अपने परिवार के पालन-पोषण के लिए नमकीन-दालमोठ बनाने की फैक्ट्री लगा रखी है।
लोगों की मदद करने में ही अब ऐसा सुख मिलता है कि जब कश्मीर में बाढ़ आई थी तो अपने साथियों के साथ वहां पीड़ितों की मदद को पहुंच गए और बाढ़ में डूब रहे कई लोगों को बचाया। वह कहते भी हैं कि सेवा कार्य अब जुनून बन गया है। जिंदगी का मकसद भी यही है।