अपनों के खोने का दर्द सभी को दुखी कर देता है। कुछ लोग अपनोें के गम में हिम्मत हार जाते हैं तो कुछ बहादुरी से समाज के लिए कुछ करने का संकल्प ले लेते हैं। ऐसा ही संकल्प सुनीता कनौजिया ने अपनी कैंसर पीड़ित बेटी को खोने के बाद लिया और गरीब व निराश्रित बच्चों की शिक्षा में अपना जीवन समर्पित कर दिया।
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सुनीता कनौजिया बच्चों को सामान बांटते हुए
- फोटो : अमर उजाला
सुनीता 10 साल से नियमित अस्पतालों में जाकर कैंसर पीड़ित बच्चों को जरूरी सामान मुहैया कराने में जुटी है। वहीं, बस्तियों में जाकर बच्चों को पढ़ाना और उन्हें स्टेशनरी आदि उपलब्ध कराना उनकी जीवनचर्या बन चुकी है।
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सुनीता कनौजिया बच्चों को सामान बांटते हुए
- फोटो : अमर उजाला
गणेशगंज में रहने वाली सुनीता कनौजिया बताती हैं कि वर्ष 2009 में उनकी बेटी रिया की मौत हो गई थी। उसे ब्लड कैंसर था। काफी कोशिश और इलाज के बावजूद उसे नहीं बचाया जा सका। उसकी मौत के बाद वह टूट सी गईं।
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सुनीता कनौजिया बच्चों को सामान बांटते हुए
- फोटो : अमर उजाला
फिर उन्हें ख्याल आया कि अस्पताल में कई ऐसे बच्चे भी हैं जिनके माता-पिता की आर्थिक हालत बहुत अच्छी नहीं है। इसलिए मन में आया कि क्यों न इन बच्चों को उनकी जरूरतों का सामान मुहैया कराया जाए।
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सुनीता कनौजिया
- फोटो : अमर उजाला
शुरुआत में काम थोड़ा कठिन था, लेकिन अब हर पीड़ित बच्चे में अपनी बेटी रिया नजर आती है। इसलिए रिया फाउंडेशन के नाम से एक संस्था बनाई और लोगों की मदद करना शुरू कर दिया।
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सुनीता बच्चों के साथ केक काटते हुए।
- फोटो : अमर उजाला
कैंसर पीड़ित बच्चों के साथ ही आसपास की बस्ती में रहने वाले दुर्बल आय वर्ग के बच्चों को पढ़ाने तथा उन्हें जरूरत का सामान देने की शुरुआत भी उन्होंने इसके बाद कर दी।
सुनीता बच्चों के साथ केक काटते हुए।
- फोटो : अमर उजाला
अपनी खर्च में कटौती कर दूसरों के लिए खरीदें खुशियां
सुनीता कनौजिया कहती है कि लोग अपने शौक पूरे करने के लिए खूब खर्च करते हैं। केवल शौक के लिए महंगे-महंगे सामान खरीदते हैं। अपनी जरूरत को सीमित करके हम जरूरतमंद बच्चों के लिए सामान खरीद सकते हैं। कोशिश करें कि अस्पताल और अपने आसपास के बच्चों को सामान मुहैया कराएं।