मुंशी जी थे तो ब्राह्मण लेकिन वह हर मजहब का सम्मान करते थे। चेहरे पर लंबी दाढ़ी और पठानों की तरह लंबा कद। कई बार ब्राह्मण तो दूर उनके हिंदू होने के बारे में भी धोखा खा जाते थे। उनका हुलिया देखकर ज्यादातर लोग समझते कि वह मुसलमान हैं।
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मुंशी नवल किशोर
- फोटो : डेमो
कहा जाता है कि उत्तर भारत में मुंशी नवल किशोर ने ही पहली बार कुरान को अलग-अलग भाषाओं में छापना शुरू किया। मुस्लिम देशों से हिंदुस्तान आने वाले बड़े-बड़े लोग तो जैसे मुंशी जी के दीवाने थे।
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मुंशी नवल किशोर
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वर्ष 1888 में शाह ईरान ने तो बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस करके कहा, ‘मेरे हिंदुस्तान आने के दो ही मकसद हैं। एक तो वायसराय से मिलना और दूसरे मुंशी नवल किशोर से।’ इतिहासविद् प्रो. पंकज कुमार बताते हैं, ‘ईरान के प्रोफेसर मोहम्मद तवकोली तरगी ने 1992 में लखनऊ आकर मुंशी नवल किशोर प्रेस के बारे में कई सारी दिलचस्प जानकारियां जुटाई।
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मुंशी नवल किशोर
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तरगी ने लिखा है, ‘मेरी मुलाकात पुरानी दिल्ली के जिल्दसाज से हुई। उसने कई सारी बातें बताई। पूर्वजों का हवाला देते हुए यह भी बताया, ‘मुंशी जी के यहां जब कुरान की छपाई होती थी तो काफी सफाई रखी जाती थी। कुरान की पवित्रता का पूरा ध्यान रखा जाता था।
छपे हुए पन्नों की जिल्दसाजी करने वाले जब आते थे तो उनसे काम कराने से पहले मुंशी जी ‘वजू’ करने का आग्रह करते। वजू करने के बाद ही जिल्दसाजों को कुरान की जिल्दसाजी करने की इजाजत होती थी।’