लखनऊ के द्विवेदी बंधु शिवकुमार, कृष्णकुमार और विष्णु कुमार ने 1942 की क्रांति में अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया था। अंग्रेजी हुकूमत ने इन भाइयों की गिरफ्तारी के लिए तेजतर्रार अफसरान एचजे टॉम, जीडी पारकिन सहित करीब 50 जासूसों की टीम लगा दी। पर, भूमिगत होकर अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोले द्विवेदी बंधुओं को पकड़ नहीं सके। अंग्रेजों ने इन भाइयों का सामान कुर्क करा दिया था।
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डेमो
भरोसा गांव के बाग और जमीन नीलाम करा दी थी। घर भी खोदवाकर बरबाद कर दिया था। ब्रिटिश सरकार में खुफिया विभाग में काम करने वाले धर्मेन्द्र गौड़ ने संस्मरण में लिखा है, ‘तारीख थी 8 अक्तूबर 1945। शाम स्टेशन रोड स्थित राजा बख्शी की कोठी से एक मोटरकार निकलकर एपी सेन रोड, पानदरीबा, नाका हिंडोला से दुगावां होती हुई तेजी से बिरहाना की ओर बढ़ी।
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कार को राजा बख्शी चला रहे थे और उनकी बगल में बैठे थे फिरोज गांधी। पीछे की सीट पर बैठे थे जवाहरलाल नेहरू। गाड़ी बिरहाना में शिवाला के पास आकर रुक गई। मोहल्ले के लड़कों की इन पर नजर तो पड़ी, लेकिन उन्हें यकीन नहीं हो रहा था।
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पंडित जवाहरलाल नेहरू
नेहरू ने शिवकुमार द्विवेदी का मकान पूछा तो बालकों का संदेह जाता रहा। वे जवाहर लाल नेहरू जिंदाबाद के नारे लगाने लगे। एक गली में बालकों ने नेहरू को एक पुराने जर्जर मकान को दिखाते हुए कहा, ‘यही है।’