लखनऊ में उत्तर भारत का पहला छापाखाना लगाने वाले मुंशी नवल किशोर परंपरा और आधुनिकता के बीच समन्वय रखने वाले व्यक्ति थे। बल्लभ संप्रदाय की परंपरा में पले नवलकिशोर सभी संप्रदायों का सम्मान करते थे। यही वजह रही कि इस्लाम और हिंदू धर्म के ग्रंथों का उर्दू व हिंदी में अनुवाद कराकर छापना शुरू किया। उन्होंने 1868 में ही कुरान को सुंदर तरीके से छपवाकर लोगों के लिए उपलब्ध कराया।
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मुंशी नवल किशोर
- फोटो : amar ujala
कुरान का मूल्य 1.50 रुपये रखा ताकि आम मुसलमान इसे आसानी से खरीद सके। मुंशी नवल किशोर और उनका प्रेस पुस्तक के एक प्रसंग से पता चलता है, ‘मुंशी जी की उदारता का हाल यह था कि वह एक तरफ संस्कृत पाठशालाओं को बढ़ावा देते। उन्हें मुफ्त किताबें देते। दूसरी तरफ इस्लाम की धर्म व परंपराओं से संबंधित प्राचीन ग्रंथों, साहित्य की पुस्तकें छपवाकर इस्लामी शिक्षा देने वाले संस्थान देवबंद को मुफ्त भिजवाते थे।
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मुंशी नवल किशोर
- फोटो : डेमो
एक तरफ वह देवबंद की सहायता करते थे तो दूसरी तरफ वह सर सैयद अहमद के इस्लामी सुधार आंदोलन में भी सक्रिय थे। देशप्रेम की भावना से ओतप्रोत मुंशीजी अंग्रेजों के मित्र होते हुए भी आजादी के आंदोलन का समर्थन करते।
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मुंशी नवल किशोर
- फोटो : डेमो
एक बार कोई अंग्रेज उनसे मिलने आया तो बात चल पड़ी ज्ञान व विज्ञान पर। बात होते-होते श्रेष्ठता तक पहुंच गई। उसने मुंशीजी से कह दिया, ‘देखिए! मेेरे यहां कितने पुस्तकालय हैं। लोग कितना पढ़ते-लिखते हैं।
मुंशीजी को बात ऐसी चुभी कि उन्होंने देश में 37 स्थानों पर पुस्तकालय स्थापित करा दिए। साथ ही इंग्लैंड के आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय को 2000 पुस्तकें दान कर दीं।’