कारगिल युद्ध में दो महीने तक दुश्मनों से मोर्चा लेने के बाद वीर जांबाजों ने दुश्मनों को खदेड़ दिया था। इस दौरान लद्दाख से लेकर हिमालय की दुर्गम व जोखिम भरी पहाड़ियों, ग्लेशियरों से भरी चोटियां को पार कर अदम्य शौर्य व साहस का परिचय देने वालों में इंदिरानगर निवासी मेजर रितेश शर्मा का नाम भी शामिल हैं।
विज्ञापन
2 of 6
मेजर रीतेश शर्मा
- फोटो : अमर उजाला
मेजर रीतेश उन जांबाज सिपाहियों में शामिल हैं, जिन्होंने कारगिल में विजय के बाद साथी जवानों की वीरता की कहानियां लोगों को सुनाईं। खुद अदम्य साहस का परिचय देते हुए कारगिल में दुश्मनों को खदेड़ा और जीत के नायक बने। लामार्टीनियर कॉलेज के छात्र रहे मेजर रीतेश शर्मा 9 दिसंबर, 1995 को सेना में भर्ती हुए। ड्यूटी के दौरान वह मई, 1999 में 15 दिनों की छुट्टी लेकर लखनऊ अपने घर आए थे।
विज्ञापन
3 of 6
मेजर रीतेश शर्मा
- फोटो : amar ujala
इसी दौरान कारगिल युद्ध की सूचना मिली कि जवानों की पेट्रोलिंग टुकड़ी की कोई जानकारी नहीं मिली। इससे पहले कि रेजीमेंट उन्हें बुलाती, वह बगैर बुलाए ही ड्यूटी पर पहुंच गए। चूंकि, जाट रेजीमेंट पहले ही कारगिल की ओर कूच कर चुकी थी, इसलिए मेजर रीतेश ने यूनिट के साथ दुश्मनों से मोर्चा लेते हुए चोटी पर तिरंगा फहरा दिया था। इसी क्रम में दो और चोटियों पर भी फतह हासिल की। पर, मश्कोह घाटी जीतते हुए वह घायल हो गए।
4 of 6
मेजर रीतेश शर्मा
- फोटो : amar ujala
उन्हें बेस कैम्प में लाया गया और कमान कैप्टन अनुज नैयर को सौंप दी गई, जो कारगिल में शहीद हो गए। मश्कोह घाटी में तिरंगा फहराने के कारण ही 17 जाट रेजीमेंट को मश्कोह सेवियर का खिताब भी दिया गया। कारगिल के बाद 25 सितंबर, 1999 को कुपवाड़ा में आतंकी ऑपरेशन के दौरान मेजर शर्मा खाई में गिर गए थे, जिसके बाद अस्पताल में इलाज के दौरान उनका निधन हो गया था।
विज्ञापन
5 of 6
मेजर रीतेश शर्मा
- फोटो : amar ujala
शहीद की स्मृति में छात्रवृत्ति व मेडल
शहीद के पिता सत्यप्रकाश शर्मा ने बताया कि बेटे की याद में एक स्कॉलरशिप व गोल्ड मेडल दिया जाता है। इंदिरानगर स्थित जनकल्याण आंख अस्पताल में टॉपर्स को शहीद मेजर रितेश शर्मा की याद में गोल्ड मेडल, जबकि रानी लक्ष्मीबाई स्कूल में एक हजार रुपये की छात्रवृत्ति प्रदान की जाती है। यह गोल्ड मेडल व छात्रवृत्ति हर साल प्रदान की जाती है।
लोकप्रिय कोटेशन
‘दुश्मनों के सीने को गोलियों से छलनी करने की ताकत एक फौजी में होती है। सरहदों की रक्षा की जिम्मेदारी उठाता है, पर इंजीनियर ऐसा नहीं कर सकता। वह दुश्मनों को धूल नहीं चटा सकता।’