वैसे तो नवाबों के शहर लखनऊ में दर्जनों ऐसी इमारतें है, जहां से नवाबी दौर के वैभव को देखा जा सकता है, लेकिन कुछ इमारतें ऐसी भी हैं जो 1857 की क्रांति की कहानी बयां करती हैं। किस तरह हमारे क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश फौजों को हिंदुस्तान छोड़ने पर मजबूर किया। भारतीयों पर अत्याचार करने वाले अंग्रेज अफसरों को उनके घर में घुसकर मारा था। आज भी इन इमारतों पर गोला बारूद और बंदूकों की गोलियों के निशान हैं। ...तो चलिए, आज हम आपको वहां ले चलते हैं, जहां हमारे वीर क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी फौजों से लोहा लिया और आजादी के लिए कुर्बान हो गए...।
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रेजीडेंसी में 86 दिनों तक घेरे रखा अंग्रेजों को
शहर की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक इमारतों में शुमार है रेजीडेंसी। इसका निर्माण नवाब आसिफद्दौला ने 1775 में शुरू करवाया था, जिसे नवाब सआदत अली ने 1800 ई. में पूरा कराया। इस इमारत में छह बड़े-बड़े परिसर हैं। गोमती किनारे 33 एकड़ में फैली इस इमारत में 1857 की क्रांति के दौरान क्रांतिकारियों ने अंग्रेज अफसरों को 86 दिनों तक घेरे रखा। इस संघर्ष के दौरान क्रांतिकारियों ने अंग्रेज कमांडर सर हेनरी लॉरेंस को मौत की नींद सुला दिया था।
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इसलिए खास : 1857 की क्रांति से इस इमारत का गहरा ताल्लुक रहा है। क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों से अपनी आजादी की पहली लड़ाई यही लड़ी, जो इतिहास के पन्नों में दर्ज है। इसी लड़ाई के बाद हर वर्ग के लोगों ने अंग्रेजों के खिलाफ चल रहे आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। ब्रिटिश सरकार के हुक्मरान इसी इमारत में रहा करते थे। क्रांतिकारी इस इमारत के चारों तरफ फैल गए थे और अंग्रेज अफसरों को 86 दिनों तक घेर कर रखा। घमासान संघर्ष हुआ। उन संघर्षों की दास्तां आज भी बम के गोलों से खंडहर हुई इमारत बयां करती है। उस संघर्ष के दौरान यहां सैकड़ों लोग मारे गए थे, जिन्हें बाद में इसी परिसर में दफना दिया गया।
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सिकंदर बाग में अंग्रेजों पर टूट पड़ीं ऊदा देवी
1857 के भारतीय विद्रोह के दौरान हुई लखनऊ की घेराबंदी के समय ब्रिटिश सेना से घिरे सैकड़ों भारतीयों ने इसी बाग में शरण ली थी। 16 नवंबर 1857 को ब्रिटिश फौजों ने बाग पर चढ़ाई कर लगभग 2000 से अधिक सिपाहियों को मार डाला था। वर्षों बाद तक बाग से तोप, गोला बारूद, तलवारें, ढाल और हथियारों के टूटे हिस्से मिलते रहे, जिन्हें अब संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया है। इस घमासान के दौरान बाग की दीवारों पर पड़े निशान इस ऐतिहासिक घटना की गवाही देते हैं। इस लड़ाई में वीरांगना ऊदा देवी की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने ब्रिटिश सेना से घिरे भारतीयों की मदद की। उन्होंने पुरुषों के वस्त्र धारण कर बाग के सबसे ऊंचे पेड़ पर चढ़कर अंग्रेज सेना पर खूब गोले बरसाए। अंग्रेजों से तब तक लड़ती रहीं, जब तक उनके पास गोला बारूद रहा। गोलियों से छलनी होकर दम तोड़ दिया पर झुकीं नहीं। हाल ही में बाग में ऊदा देवी की प्रतिमा भी स्थापित की गई है।
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बेगम हजरत महल की याद दिलाता है यह पार्क
अवध के शासक वाजिद अली शाह की पहली पत्नी हजरत महल महान क्रांतिकारी, चतुर रणनीतिकार और कुशल प्रशासक थीं। 1857 की क्रांति के दौरान जब देशभर में क्रांतिकारियों ने अंग्रेज फौजों की नाक में दम कर रखा था, उस समय अंग्रेजी हुकूमत ने बेगम के पति नवाब वाजिद अली शाह को हिरासत में लेकर कलकत्ता भेज दिया था। उस दौरान बेगम हजरत ने साहस और वीरता का परिचय देते हुए अवध की बागडोर संभाली। अपने नाबालिग बेटे बिरजिस कादर को गद्दी पर बैठाकर अंग्रेजी फौज से डटकर मुकाबला किया, हालांकि लंबी लड़ाई के बावजूद अंग्रेज फौज से हार गईं। आखिरकार, बेगम को नेपाल में शरण लेनी पड़ी। वहीं उनका इंतकाल हो गया। उनकी याद में हजरतगंज के विक्टोरिया पार्क को बेगम हजरत महल पार्क नाम दिया गया। उनकी याद में यहां एक संगमरमर का स्मारक भी बनवाया गया है।
दिलकुशा कोठी था क्रांतिकारियों का ठिकाना
गोमती किनारे बनी इस कोठी को एक ब्रिटिश मेजर गोरे ऑस्ले ने बनवाया था, जो नवाब साहब के दोस्त थे। 1800 ई. में बनी इस कोठी को आजादी की पहली लड़ाई के दौरान स्वतंत्रता सेनानियों ने इसका इस्तेमाल किया था। हालांकि भारी बमबारी के बाद ब्रिटिश सेना ने इस पर कब्जा कर लिया था तभी से यह कोठी अपनी भव्यता और महिमा खोती चली गई।