कला-संस्कृति और साहित्य में भी कुछ ऐसी ही शख्सियते हैं जो आत्मविश्वास के दम पर सशक्त बनकर उभरीं। ये शख्सियतें बाधाओं से डरी नहीं। अपने सपने खुद बुने, घर-परिवार-समाज और नौकरी की सारी जिम्मेदारियां निभाते हुए अपने कॅरिअर को, अपने शौक को एक नया आयाम दिया। रोली खन्ना बता रही हैं कि ये शख्सियतें आलोचनाओं से घबराई नहीं, बल्कि अपने काम और व्यवहार से उन्हें भी अपना मुरीद बना लिया।
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महिला दिवस
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महिला दिवस
- फोटो : amar ujala
नसीम निकहत का जन्म बाराबंकी में हुआ। बुआ और फूफा ने गोद ले लिया और चलीं आईं लखनऊ। एक तरफ फूफा की दी आजादी, दूसरी तरफ बुआ के सख्त बंधन। उस पर से घर में सजने वाली बेंतबाजी की महफिलें। ऐसे मिले-जुले माहौल में मासूम मन के किसी कोने में नन्ही शायरा जन्म ले चुकी थी। गुनगुना नहीं सकती थीं, क्योंकि बुआ कहती थीं कि बडे़ घर की बेटियों का काम नहीं ये सब। आखिर जिसका डर था वही हुआ, स्कूल में एक कार्यक्रम में चार लाइनें क्या सुना दी, बुआ ने तूफान खड़ा कर दिया।
बुआ ने कई थप्पड़ रसीद किए। इसके बाद मन और बगावती हो चला और फिर छिप-छिप कर सुनने-सुनाने का सिलसिला चल पड़ा। इस बीच फूफा चल बसे और मामी ने बिना पूछे- मेरी इच्छा जाने मेरा विवाह कर दिया। इस दौरान गजल मन में खुद-ब-खुद बनती जा रही थी। सौभाग्य से मेरे ससुर और पति को गजल व शेर-ओ शायरी का शौक था। एक दिन रसोई में मुझे कुछ गुनगुनाते सुना तो ससुर ने सुनाने को कहा। इसके बाद उन्होंने मुझे देवा में हुए मुशायरे में भेजा।