आस्था, उल्लास और तपस्या का संगम है छठ पर्व। चार दिन तक चलने वाला यह एक कठिन व्रत है। कहते हैं न कि दिल में आस्था हो तो हर तप एक निखार लाता है। ऐसा ही है यह व्रत। यह कहना है उन व्रती महिलाओं का जो पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही इस परंपरा को न केवल सहेज रही हैं, बल्कि पूरे हर्षोल्लास से इस त्योहार को मना रही हैं। आइए, जानते हैं कि व्रती महिलाएं विरासत में मिली इस आस्था का कैसे निर्वहन कर रही हैं।
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नीलिमा सिंह
- फोटो : अमर उजाला
बेटा होने के बाद उठाया व्रत
जीजीआईसी गोमतीनगर में शिक्षिका नीलिमा सिंह का रिश्ता प्रयागराज, बलिया और मिर्जापुर से है। कहती हैं कि लखनऊ में 1996 से रह रहे हैं। बेटा होने के बाद 1997 से व्रत उठाया है। कठिन व्रत है, ये मालूम था। लेकिन आस्था ने हिम्मत दी और व्रत करने की ताकत मिली। नई पीढ़ी में भी यह आस्था बरकरार है। कोरोना के कारण बेटा अभी यहीं पर है, लेकिन जब अमेरिका में था तो भी वह आनलाइन मौजूद रहता था। मैं खुद एक साल यूएस में थी, लेकिन वहां भी पूजा की थी।
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अनामिका चतुर्वेदी
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पति ने कहा, तुम मां से व्रत ले लो, मैं मदद करूंगा
फिटनेस ट्रेनर और इंटीरियर डिजाइनर अनामिका चतुर्वेदी कहती हैं कि 10 साल से अधिक वक्त से हम लोग लखनऊ में रह रहे हैं। इससे पहले बिहार के समस्तीपुर में रहते थे। लखनऊ आने के बाद आना-जाना मुश्किल हुआ तो पति ने कहा कि तुम मां से व्रत ले लो, मैं मदद कर दूंगा। तब से व्रत कर रही हूं। आज भी पति प्रभाकर कुमार पांडेय पकौड़ी बनाकर खिलाकर गए हैं। कठिन है व्रत, लेकिन सबके साथ से आसानी से हो जाता है। नौकर से कोई काम नहीं करवाते, सारा काम खुद करते हैं।
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विभा शर्मा
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सासू मां ने तीन बहुओं में से मुझे चुना
गंगा अपार्टमेंट में रहने वाली विभा शर्मा रांची की रहने वाली हैं। 10 साल से लखनऊ में रह रही हैं और तीन साल से यहां पूजा कर रही हैं। कहती हैं कि 14-15 साल पहले सासू मां ने मुझे यह व्रत सौंपा। तीन बहुओं में से उन्होंने मुझे चुना, यह मेरा सौभाग्य है। यहां दोस्तों का एक बड़ा ग्रुप है। कोई सूप लाता है तो कोई कुछ। सभी इस व्रत को सफल बनाने में जुटते हैं। पति मुकेश कुमार शर्मा व सबके सहयोग से व्रत आसानी से पूरा हो जाता है। मायके में भी यह होता था। बचपन से देखा सुना था, इसलिए कभी दिक्कत नहीं हुई।
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आरती पांडेय
- फोटो : अमर उजाला
पहला व्रत छठी मइया ने पूरी की घर में बेटी की कमी
लोक गायिका आरती पांडेय का यह पहला व्रत है। कहती हैं कि भरा-पूरा परिवार है। हमारे यहां बेटी की कमी थी। मेरे भी तीन बेटे हैं, बेटों के आगे भी बेटी नहीं थी। छठी मइया ने यह कामना भी पूरी कर दी है। खुशी की बात ये है कि बहू ने जुड़वा बच्चों को जन्म दिया है, इनमें एक बेटा और एक बेटी है।
मायके से मिली ये परंपरा
आम तौर पर सास से बहुओं को परंपरा मिलती है, लेकिन चौक निवासी स्मिता कोहली को अपने मायके से ये परंपरा मिली है। कहती हैं कि पटना में है मेरी मां का घर। वहां लोग इसे पूरी आस्था से निभाते हैं। कई साल पहले की बात है, एक घटना ने मुझे ये व्रत करने के लिए प्रेरित किया और छठी मइया में आस्था का प्रभाव मैंने देखा। तब से लगातार इस व्रत को करती आ रही हूं।