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किसी ने हिजाब पहनकर संभाली पिस्टल तो किसी ने व्हीलचेयर को बना ली ताकत, पढ़ें ये स्पेशल रिपोर्ट

Tue, 06 Apr 2021 03:36 PM IST
ishwar ashish रोली खन्ना/सुधांशु सक्सेना, अमर उजाला, लखनऊ
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- फोटो : amar ujala
‘मंजिलें भी जिद्दी हैं, रास्ते भी जिद्दी हैं, देखते हैं कल क्या हो, हौंसले भी जिद्दी हैं...’ अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर इन शब्दों के साथ अमर उजाला सलाम करता है सभी महिलाओं को, उनके हौसले और उनके संकल्पों को, जिनके बूते उन्होंने अपनी पहचान तो बनाई साथ ही समाज को भी हर पल कुछ नया देने की कोशिश कर रही हैं। शारीरिक, मानसिक, आर्थिक व सामाजिक लाचारी को उन्होंने अपने रास्ते की बाधा बनने नहीं दिया। तय कर लिया और आगे बढ़ चलीं, रास्ते बनते गए और वे एक नया संसार रचती गईं। किसी ने खेल में तो किसी ने बिजनेस, स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में खुद की पहचान बनाई। इनकी उड़ान भरती कोशिशों पर रोली खन्ना व सुधांशु सक्सेना की एक रिपोर्ट।
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शाजिया तमन्ना - फोटो : amar ujala
हिजाब पहन संभाली पिस्टल, आलोचना झेल बनी शूटर
मेरा नाम शाजिया तमन्ना है। एक आम महिला की तरह मेरी भी 21 साल की उम्र में शादी हो गई। हमेशा मन में कुछ अलग करने की चाह थी, लेकिन सास-ससुर की सेवा और दो बच्चों की जिम्मेदारी में ऐसी उलझी कि दस साल कब गुजर गए पता ही नहीं चला। 30 वर्ष की उम्र में एक दिन पति से पिस्टल और राइफल शूटिंग में जाने की इच्छा जाहिर की। पति जमाल असगर ने सपोर्ट किया, लेकिन लोग पीठ पीछे मेरा मजाक उड़ाते थे। कई लोगों ने कहा कि ये पुरुष प्रधान समाज का क्षेत्र है और इसकी राह आसान नहीं है।

खूब आलोचना हुई लेकिन इनसे मैं डरी नहीं, इन आलोचनाओं को झेल कर लगातार तीन साल तक अपने पति से हीपिस्टल और राइफल चलाने की ट्रेनिंग ली। चूंकि मैं एक शिक्षिका भी थी तो सोमवार से शनिवार तक बिजी शेड्यूल रहता है, इसके बावजूद हर हफ्ते रविवार को घर के सारे कामकाज निपटा कर शूटिंग रेंज जाती और अपनी कोशिश जारी रखती। मुझे सलवार सूट और हिजाब में राइफल और पिस्टल चलाते जिसने भी देखा, उसने तारीफ बाद में की और आलोचना पहले की।

तीन साल की कड़ी मेहनत के बाद धीरे-धीरे शूटिंग रेंज पर होने वाली प्रतियोगिताओं में प्रतिभाग करना शुरू किया। एयर राइफल से शुरू हुआ ये सफर धीरे-धीरे पिस्टल शूटिंग से होता हुआ ट्रैकशूटिंग की ओर बढ़ रहा है, जिसमें 7 से 8 किलो की भारी राइफल से शूटिंग की जाती है। मैं अब अवध राइफल क्लब के फीमेल विंग का प्रतिनिधित्व करती हूं और स्टेट लेवल कंपीटीशन की तैयारी कर रही हूं। मैं राइफल व पिस्टल शूटिंग के क्षेत्र में देश का प्रतिनिधित्व करना चाहती हूं।





कोई भी क्षेत्र महिला या पुरुष प्रधान नहीं होता
मैं अपने जैसी घरेलू महिलाओं और बच्चियों को हमेशा सेल्फ डिफेंस की ट्रेनिंग लेकर हर परिस्थिति से निपटने के लिए खुद को तैयार करने की सलाह देती हूं और हमेशा बच्चियों और महिलाओं को सिखाती हूं कि कोई भी क्षेत्र पुरुष या महिला का नहीं होता, किसी भी क्षेत्र में किसी का एकाधिकार नहीं है। अगर मन में संकल्प हो तो हर क्षेत्र में महिलाएं अपना परचम फहरा सकती हैं।
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सुमन रावत - फोटो : amar ujala
व्हीलचेयर कमजोरी नहीं मेरी ताकत है
मेरा नाम सुमन रावत है। तीन चार साल की थी, तब बुखारा आया और पैर में उतर गया। मैं चलने-फिर में असमर्थ हुई और विशेष बच्चों में गिनी जाने लगी। मेरा शिक्षा भी ऐसे ही स्कूल में हुई। कक्षा सात में थी तो किसी ने कैंप में जाने की सलाह दी, मेरा दुर्भाग्य था कि ठीक होने के बजाय और लाचार हो गई। जिस नस में इंजेक्शन लगाना था, डॉक्टर ने दूसरी नस में लगा दिया। मेरे पापा आज भी ठेला लगाते हैं, दूर पढ़ाई करने भेजना संभव नहीं था। पढ़ाई छूटी घर बैठ गई, पर मेरी लगन सच्ची थी, मुझे मदद मिल गई और पढ़ाई शुरू हो गई।

आज मैं बीएड कर रही हूं। स्कूल में मैंने खेल के बारे में बस यूं ही एक दिन शुरुआत हो गई, मैंने जेवलिन डिस्कस आउटपुट खेलना शुरू किया, साधन थे नहीं तो ईंटे से प्रैक्टिस करती थी। स्टेट लेवल तक सफलता मिली, मुझे बताया गया कि भाला फेंकने से मेरी रीढ़ की हड्डी पर असर आ सकता है, क्योंकि पैर में दिक्कत पहले से थी। वह खेल बंद कर दिया। यहां फिर मुझे मार्गदर्शन मिला और मैं बैडमिंटन की प्रैक्टिस करने लगी। बनारस खेलने गई थी, वहीं मुझे बताया गया कि व्हील चेयर पर बैठकर बैडमिंटन खेला जाता है। एक नई राह मिल गई। व्हीलचेयर पर दसों बार गिरी, फिर इतनी अभ्यस्त हो गई कि तीन बार नेशनल खेला और तीनों बार सिल्वर, ब्रांज और गोल्ड मेडल जीत चुकी हूं। 2020 में कोरोना के कारण सफर थमा है, जो फिर से शुरू होगा। सपना इंटरनेशनल खेलने का है, कोशिश जारी है।

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सुमन रावत - फोटो : amar ujala
हर किसी का सपना पूरा हो
मेरे पिता ने हर मुश्किल झेली, पर मुझे पढ़ाया, मेरे भाइयों ने पढ़ाई इसलिए छोड़ी की मैं पढ़ सकूं। मैं उनके हर सपने को पूरा करना चाहती हूं। इतना ही नहीं मैं निशुल्क कोचिंग लेती हूं उन बच्चों की जो पढ़ने में कमजोर हैं और आर्थिक रूप से कमजोर हैं।
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रितु जायसवाल - फोटो : amar ujala
शादी के 20 साल बाद, होम शेफ बन बनाई खुद की पहचान
मेरा नाम रितु जायसवाल है। हमारा संयुक्त परिवार है, पति हैं, एक बेटा 12वीं और दूसरा कक्षा 5वीं में पढ़ता है। इसके अलावा सास-ससुर और बाकी अन्य लोग हैं। शादी के बाद सारा फोकस परिवार और बच्चों की बेहतर परवरिश पर रहा। बच्चे बड़े हो गए, एक दिन बेटे को लेकर हॉबी कोर्स के लिए एक इंस्टीट्यूट गई थी, वहां से लौटी तो डिप्लोमा कोर्स के लिए अपना दाखिला कराकर। उस दिन मुझे भी खुद के बारे में पता चला यानी मैंने खुद से पूछा तो पता चला कि मैं कुछ करना चाहती थी। यह सब शादी के 20 साल बाद यानी 2017 की बात है। 2020 में मैंने एक छोटी सी कोशिश शुरू की होम शेफ के रूप में। अभी न मेरा आउटलेट है, न शो रूम है और न ही कोई ऑनलाइन स्टोर। मैं खुद को होम शेफ कहलाना पसंद करती हूं और घर से ही लोगों की पसंद की चीजें बना रही हूं। लोग ऑर्डर देते हैं, फीडबैक में पता चलता है कि मेरा बनाया केक, लोगों से अलग है। बस स्वाद की जंग जीत चुकी हूं। एक सपना है कि मेरी अपनी बेकरी हो।

क्यों जरूरी है अपनी पहचान
अक्सर आर्थिक तंगी हमें कुछ करने के लिए प्रेरित करती हैं, लेकिन मुझे खुद की तलाश ने एक नए रास्ते पर चलने की ताकत दी। कई बार हम जिम्मेदारियों में खुद को भूल जाते हैं। हम महिलाओं को अपनी पहचान खोने नहीं देनी है।
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स्मृति यादव - फोटो : amar ujala
भरतनाट्यम की डगर पर चलकर बनीं नजीर
मेरा नाम स्मृति यादव है। मैं अभी 23 साल की हूं। आठ साल की उम्र से ही मेरा झुकाव डांसिंग में था। घर की छोटी सी टेलीविजन स्क्रीन पर जब थिरकते हुए डांसिंग स्टार्स को देखती तो मेरा भी मन उन्हीं की तरह डांसिंग के क्षेत्र में एक मुकाम हासिल करने का होता। दस साल की उम्र से मेरा झुकाव भरतनाट्यम की ओर हो गया। मेरे पिता हरीश यादव मुझे पहली बार घर के पड़ोस में बने डांसिंग इंस्टीट्यूट तक ले गए और मेरा दाखिला कराया, लेकिन ये डगर इतनी आसान नहीं थी।

घर की आर्थिक स्थिति भरतनाट्यम की महंगी शिक्षा के आड़े आ रही थी। लेकिन, मैंने हार न मानने की ठान रखी थी तो पंद्रह साल की उम्र में भातखंडे जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में मेरा चयन हुआ। वहां, करीब चार साल में भरतनाट्यम की विषारद की डिग्री हासिल की। हालांकि जिंदगी ने अभी भी इम्तिहान लेना बंद नहीं किया। पिता की एक गंभीर बीमारी ने आर्थिक तंगी के हालात पैदा कर दिए, लेकिन मैंने हार नहीं मानी और ट्यूशन पढ़ाकर अपना खर्च निकालना शुरू किया, धीरे-धीरे भरतनाट्यम की डगर पर कदम आगे बढ़ाती गई और एक  के बाद एक कई अवॉर्ड हासिल करती गई। हाल ही में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने नेशनल यूथ फेस्टिवल में प्रदेश स्तर पर भरतनाट्यम का प्रतिनिधित्व करने और शानदार प्रस्तुति के लिए सम्मानित किया। मेरी ख्याति देखकर कई बच्चियां मुझसे भरतनाट्यम की विधा सीखने के लिए आती हैं। मैं अपने यू ट्यूब चैनल पर भी काम कर रही हूं, जिसमें भरतनाट्यम से जुड़े टिप्स भी शेयर करती रहती हूं। हमेशा मन में यही इच्छा रहती है कि इस दिशा में आगे बढ़ते हुए वैश्विक स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व करूं।

आर्थिक तंगी न बने किसी की राह का रोड़ा
मेरा संकल्प है कि भरतनाट्यम में अपना कॅरियर बनाने का सपना देखने वाली किसी भी बच्ची की राह में उसकी आर्थिक तंगी को रोड़ा न आने दूं। मैं लगातार भरतनाट्यम में कुछ न कुछ नया सीखती रहती हूं और जिन एक दर्जन बच्चों को मेंटर करती हूं, उन्हें भी सिखाती रहती हूं। मैं महिलाओं और बच्चियों को समाज और कमजोर आर्थिक स्थिति की बेड़ियों को तोड़कर हमेशा कुछ न कुछ रचनात्मक करने के लिए प्रेरित करती रहती हूं।
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अनिता - फोटो : amar ujala
....ताकि नशे के चंगुल में न फंसे बचपन
मेरा नाम अनिता है। हजरतगंज में रहती हूं। पढ़ाई तो पूरी कर ली, लेकिन जीवन का मकसद समझ नहीं आ रहा था। एक दिन एक बच्चे की नशे की लत के कारण दर्दनाक मौत ने मेरा जिदंगी जीने का नजरिया बदल दिया था। हम तीन दोस्त मैं, प्रमिला और रत्ना ने तय किया कि हफ्ते में सिर्फ एक दिन किसी स्कूल में जाकर बच्चों से बात करेंगे। हरदोई, उन्नाव के स्कूलों में हम गए, बात शुरू हुई तो पता चला कि बच्चे छिप-छिप कर कई तरह का नशा कर रहे हैं। समस्या की जड़ तक पहुंचने के लिए हमने एक टीम बनाई। हम स्कूलों में जाते हैं, वहां बच्चों से सवाल करते हैं। ये वे स्कूल होते हैं, जिनके बाहर तंबाकू मिलता है। इसके बाद उन्हीं बच्चों को साथ लेकर दुकानों पर जाते हैं, निवेदन करते हैं कि ये दुकान स्कूल से 100 गज की दूरी पर ले जाएं। बच्चों की काउंसिलिंग का नतीजा यह हुआ कि स्कूलों के बाहर दुकानें हटने लगी हैं। हम फिलहाल बंदायू, हरदोई, उन्नाव और बाराबंकी में काम कर रहे हैं। विमर्श सेवा संस्थान के बैनर तले हम नशे के चंगुल से मुक्त कराए बच्चों में हुनर विकास पर भी काम कर रहे हैं।

व्यस्त रखना होगा, नशे की आदत छुड़ाने के लिए
मुझे लगता है कि यदि हम युवाओं या बच्चों की नशे की आदत छुड़ाना चाहते हैं तो हमें इन्हें रचनात्मक कामों में व्यस्त रखना होगा।

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ममता सिंह - फोटो : amar ujala
लैंगिक दुर्व्यवहार के खिलाफ संवाद को बनाया हथियार
मेरा नाम ममता सिंह है। बीएड और टीईटी करके शिक्षक बनना था, पर किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। मेरी अपनी दोस्त के दर्द ने मेरी सोच, मेरे काम की दिशा ही बदल दी। 20 साल की उम्र में उसकी शादी हो गई थी। ससुराल जाने के 5 साल के भीतर उसने जो कुछ भी झेला, वो सोच कर मन आज भी रोता है। अचानक से एक दिन वो बदल गई और उसने अपनी लड़ाई खुद लड़ने का फैसला किया। उसके इस बदलाव ने मुझे ताकत दी, मैंने तय किया कि मैं लड़कियों के लिए कुछ ऐसा करूंगी ताकि उन्हें उनके स्वास्थ्य के अधिकार और लैंगिक दुर्व्यवहार के खिलाफ जागरूक कर सकूं। कुछ एनजीओ से जुड़ी तो काम का दायरा बढ़ा। आज क्वीन मेरी में बने सेंटर आफ एक्सीलेंस फार एडोलसेंस हेल्थ में बतौर काउंसलर काम कर रही हूं। यह महज मेरी कुछ घंटों की नौकरी नहीं बल्कि मेरा जुनून भी है। जिस वक्त मेरी बात सुनकर कोई लड़की अनचाहे गर्भ की समस्या को पीछे छोड़ आगे बढ़ती है या फिर वे कुछ अनचाहे दबाव से बाहर निकलकर आगे बढ़ती है तो वो सुकून कुछ अलग होता है।

स्वास्थ्य जागरूकता की कमी से न जाए किसी बेटी की जान
नौकरी के घंटे देख कर हम काम नहीं करते। हमारी कोशिश है कि जागरूकता की कमी और अपने स्वास्थ्य अधिकारों की जानकारी के अभाव में किसी लड़की को जान से हाथ न धोना पड़े।

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डॉ. शेफाली गौतम - फोटो : amar ujala
सेहत और शिक्षा दोनों पर फोकस
पढ़ाई के जरिए ही जिंदगी को संवारा जा सकता है। इसके जरिए समाज में एक नया आंदोलन खड़ा किया जा सकता है। इसी बात को मूल मंत्र माना है, केजीएमयू के एनेस्थीसिया विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. शेफाली गौतम ने। वह बताती है कि गरीब परिवार के लोग अभी भी बालिकाओं को उच्च शिक्षा दिलाने में हिचकिचाते हैं। ऐसे में वह ऐसे परिवारों की काउंसिलिंग करने के साथ ही गरीब परिवार के बच्चों को एमबीबीएस के बाद सुपर स्पेशियलिटी कोर्स की तैयारी के लिए लगातार मार्गदर्शन दे रही हैं।
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वीना अग्रवाल। - फोटो : amar ujala
हालात से लड़ीं, पर हार नहीं मानी
वीना अग्रवाल बचपन से ही संघर्ष और अभावों से जूझीं, लेकिन हार नहीं मानी। पहले पिता की मृत्यु के बाद ट्यूशन करके अपनी पढ़ाई पूरी की। विवाह हुआ, सबकुछ ठीक था, लेकिन पति का व्यवसाय बंद हुआ। वे बीमार हुए, सब बदल गया। एक बार फिर से ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया और बच्चों की परवरिश की। अभावों के बीच बच्चों को मानसिक रूप से मजबूत बनाया, नतीजा सभी बच्चे उच्च शिक्षा प्राप्त कर बड़े पदों पर हैं। एक बेटा बाल रोग विशेषज्ञ है, छोटा बेटा भी अपना बिजनेस करता है। उनका संघर्ष और जीवन अनुकरणीय है।
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