आज के दौर में जहां इंसान अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए किसी भी हद तक गुजर जाते हैं उस दौर में रोजाना भंडारा लगाकर भूखों को भरपेट भोजन कराना वाकई काबिल-ए-तारीफ है। ऐसे ही पुण्य के काम में जुटे हैं भगवान चौरसिया, जो एक छोटी सी किराने की दुकान के सहारे न सिर्फ परिवार का भरण पोषण कर रहे हैं बल्कि रोजाना भंडारा लगाकर जरुरतमंदों को भरपेट भोजन करा रहे हैं...।
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भगवान चौरसिया
- फोटो : अमर उजाला
विशाल भंडारा, महा भंडारा तो आपने खूब देखा होगा और प्रसाद भी चखा होगा। पर, रायबरेली रोड पर एक ऐसा भंडारा भी है, जो देखने में तो छोटा है लेकिन इस भंडारे से रोजाना दर्जनों गरीबों को भरपेट भोजन मिलता है। इस भंडारे का आयोजन एक छोटी सी किराना की दुकान चलाने वाले भगवान चौरसिया रोजाना पूरी शिद्दत के साथ करते हैं।
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भगवान चौरसिया
- फोटो : अमर उजाला
भगवान परिवार के पांच सदस्यों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी निभाने के साथ पिछले चार साल से हर रोज यह भंडारा लगाते हैं। यहां बच्चों के साथ बड़े भी भरपेट भोजन करते हैं।आवास विकास परिषद की वृंदावन योजना के सेक्टर-आठ में रहने वाले भगवान के जीवन का उद्देश्य ही भूखे को भोजन कराना है। वह हर रोज तमाम सब्जियों और दालों के मिश्रण से तहरी बनाते हैं और अपने हाथों से लोगों को भोजन कराते हैं।
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भगवान चौरसिया
- फोटो : अमर उजाला
भगवान बताते हैं कि उन्होंने तय कर रखा है कि दोपहर एक बजे से दो बजे तक लोगों को भोजन कराया जाएगा। इस दौरान जो भी भूखा-प्यासा वहां पहुंचता है उसे वह भोजन कराते हैं। भोजन करने वालों में ज्यादातर छोटे बच्चे होते हैं दूर-दूर से चलकर आते हैं। इसका कोई अंदाजा नहीं होता है कि कितने लोग भोजन करने आएंगे, लेकिन देवी कृपा से आज तक कभी भोजन कम नहीं पड़ा। करीब 20 से 25 लोग प्रतिदिन इनके भंडारे में खाना खाने पहुंचते है।
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भगवान चौरसिया
- फोटो : अमर उजाला
ऐसे हुई शुरुआत
भगवान बताते हैं कि बचपन से ही उनकी भावना प्राणी मात्र की सेवा करना रहा है। नियमित भंडारे से पहले कभी कभार भंडारा लगाकर बच्चों को खाना खिलाते थे, लेकिन 2014 में जब मां वैष्णो देवी के दरबार में पहुंचकर वहां कन्या भोज कराया तो मन में हर रोज भूखों को भोजन कराने की भावना जागी। वहां से लौटकर नियमित भंडारा शुरू किया, जो आज तक जारी है।
आयोजन में होने वाली बाधाओं के बारे में पूछने पर बताया कि एक बार जेठ के बड़े मंगल पर शर्बत पिलाने की तैयारी थी, लेकिन शाम तक कुछ इंतजाम नहीं हो सका। बहुत परेशान रहे, लेकिन रात साढ़े नौ बजे एक शख्स ने आकर बकाया साढ़े तीन हजार चुका दिए। इसके बाद आयोजन धूमधाम से किया। परिवार में दो बेटे और एक बेटी है। तीनों अभी पढ़ाई कर रहे हैं।