लखनऊ में शोकाकुल माहौल के बीच शुक्रवार को परंपरागत तरीके से शाही जरीह का जुलूस निकाला गया। अजदार अपने आंसू रोक न सके और सिसकने लगे। जुलूस देर रात छोटा इमामबाड़ा पहुुंच कर संपन्न हुआ।
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जुलूस
- फोटो : amarujala
.ऐ मोमिनों हुसैन से मकतल करीब है। मरसिया की इन लाइनें उस मंजर की याद दिलाती हैं जब करबला के मैदान में हजरत इमाम हुसैन दीन-ए-हक के लिए अपनों की कुर्बानियां पेश कर चुके हैं और अपनी मासूम बेटी हजरत सकीना से रुखसत हो रहे हैं...। मरसिया सुन रहे स्याह लिबास में अजादारों को करबला का वह कयामत का वह दिन याद आ गया जब हजरत इमाम हुसैन और उनके साथी मानवता के लिए कुर्बान हो गए।
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बारिश के बावजूद शुक्रवार शाम जिला प्रशासन के चाकचौबंद प्रबंध के बीच निकाले गए शाही जरीह के जुलूस में परंपरा के अनुसार शाही बाजा, रोशन चौकी से गूंजती मातमी शहनाई, शाही निशान लिए हाथी, ऊंट का कारवां आगे आगे चल रहा था। इसके पीछे मातमी बैंड हुसैन का गम मना रहे थे। सोजख्वान ..ऐ मोमिनों हुसैन से मकतल करीब है मरसिया पढ़ रहे थे जिसे सुन कर अजादार रो रहे थे।
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इसी के साथ हजरत इमाम हुसैन की सवारी दुलदुल, हजरत अब्बास का अलम और छह माह के मासूम अली असगर का झूला भी शोकाकुल अजादारों को रोने के लिए बेकरार कर रहा था। ताबूत, अलम और झंडों के बीच जब मोम की शाही जरीह निकली तो जुलूस के साथ चल रहे अजादार उसकी जियारत को बेकरार हो रहे थे।
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जुलूस के सबके पीछे चल रहे अंजुमन शब्बीरिया के मातमदार नौहा पढ़ रहे थे ...ये कहते थे शहेवाला सकीना हम नहीं होंगे। जुलूस में शाही घराने के साथ जिला प्रशासन के अधिकारी मौजूद रहे।
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शाम पांच बजे निकाले गए इस मोम की शाही जरीह के जुलूस से पहले आसफी इमामबाडे़ में एक मजलिस आयोजित हुई। मजलिस मेेें रसूल और उनके नवासे हजरत इमाम हुसैन के जीवन पर प्रकाश डालते हुए करबला की शहादतों का जिक्र किया गया।
मजलिस के बाद निकाला गया मोम की शाही जरीह जुलूस देर रात छोटे इमामबाड़े में रात नौ बजे सम्पन्न हुआ। अजादार शनिवार को आमद-ए-काफिला-ए-हुसैनी का पुरसोज मंजर पेश करेंगे।