छिन गया अंधी मां का इकलौता सहाराः दतली की लल्लो देख नहीं सकतीं। दोनों आंखें नहीं हैं। तीन बेटों में बूढ़ी अंधी मां का सहारा सिर्फ सियाराम ही था। चार बिस्वा जमीन से दो जून की रोटी का जुगाड़ हो नहीं सकता था सो सियाराम रिक्शा चलाता। साठ बरस का हो गया फिर भी रिक्शा खींचता। आमदनी तो इतनी थी नहीं कि कोठरी के सामने एक साबुत छप्पर डाल पाता। मां-बेटे सिर्फ दो वक्त की रोटी के जुगाड़ पर ही खुश हो लेते। पर यह सब छिन गया।
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यहां हर घर मना मातम, हर गली से निकली अर्थी!
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बेटे को सीए बनाना चाहता था, अब घर कौन चलाए? अटौरा में शिवराम के घर कोहराम मचा है। चर्चा चलते ही गांव वाले बताते हैं बड़ा जीवट था। दो बीघा की खेती ही थी। पर बच्चों को बड़ा बनाने का सपना नहीं छोड़ा। बेटा नरेंद्र लखनऊ में सीए की पढ़ाई कर रहा है। कहता था कि जल्दी दिन बहुर जाएंगे। पर शिवराम को वो खुशियां नसीब न हो सकी।
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मतईखेड़ा के रहने वाले विपिन द्विवेदी की मौत के बाद उसके परिवार में हर शख्स सदमे में है। पड़ोसियों के अनुसार विपिन कभी-कभार शराब पी लिया करते थे। रविवार रात को शराब पी तो दोबारा उठ ही नहीं पाया। तीन बीघे खेत के सहारे गुजर बसर करने वाले विपिन के परिवार में पत्नी रीता और दो छोटे-छोटे बच्चे हैं।
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खड़ता गांव के लल्लू की तीनों बेटियों को तो यह भी ज्ञान नहीं कि उनके सिर से बाप का साया उठ चुका है। सबसे बड़ी बेटी खुशबू छह साल की है। पायल चार तो आशिकी केवल दो साल की है। घर के नाम पर केवल एक छप्पर वाली कोठरी है।
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दतली के रहने वाले 40 वर्षीय लल्लू की मौत के बाद पूरा परिवार सदमे में है। जमीन के नाम पर परिवार के पास केवल चार आम के पेड़ हैं। इंदिरा आवास योजना से मिले पैसे से किसी तरह एक कमरा बन गया। पर आज तक उसमें दरवाजे लगने की नौबत नहीं आई। लल्लू की मौत के बाद परिवार के सामने रोटी का जुगाड़ करना सबसे बड़ी चुनौती है।
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खड़ता गांव का रहने वाला सजीवन बीघे भर जमीन और मजदूरी करके दोनों बेटियों सोनी और संगम की शादी के लिए पैसे जोड़ रहा था। बड़े बेटे संजय की शादी वह पहले ही निपटा चुका था। अब सजीवन के बाद उसकी पत्नी रामदुलारी पर पूरी जिम्मेदारी आ पड़ी है।
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खड़ता गांव के सिद्धेश्वर की हालत लल्लू से ज्यादा अलग नहीं है। परिवार के पास खेती के नाम पर सवा बीघा जमीन है। सिद्धेश्वर मजदूरी करके किसी तरह अपना और परिवार का पेट पाल लेता था। सिद्धेश्वर की मौत के बाद उसकी पत्नी सिद्धेश्वरी के सामने चार साल की बेटी शुभांशी और दो साल के बेटे शुभम की जिम्मेदारी आ पड़ी है।
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सिद्धेश्वर के सगे भाई मंगल के परिवार की भी ऐसी ही हालत है। यह बात अलग है कि उसके दो बेटे मजदूरी करने लायक हो गए हैं। इसलिए परिवार के सामने पेट पालने की मुसीबत थोड़ी कम है। सोनू, मोनू, रेनू, प्रियंका और छोटू की शादी से लेकर बाकी जिम्मेदारियां अभी अधूरी पड़ी हुई हैं।
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जर्जर घर में रहने वाला रामजीवन रोजाना मजूदरी करने जाता था। पत्नी की मौत काफी पहले हो चुकी थी। जमीन के नाम पर केवल चार बिस्वा है। रामसजीवन बेटी की शादी के लिए पैसे जोड़ रहा था। परिवार में अब उसका 20 साल का बेटा और 80 साल के पिता हैं।
मतईखेड़ा निवासी राधेलाल के घर के नाम पर केवल झोपड़ी है। जर्जर होने के कारण उस पर भी ऊपर से बरसाती डाली गई है। राधेलाल की मौत के बाद उसके बेटे पर पूरे परिवार की जिम्मेदारी आ गई है। जमीन भी इतनी नहीं है कि उसके सहारे गुजर बसर हो सके। (फोटोः इमरान)