मानवता को बचाने के लिए खुद 71 साथियों के साथ शहीद होने वाले इमाम हुसैन की याद में मनाया जाने वाला बलरामपुर का मोहर्रम प्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे देश में मशहूर है। यहां के बनाए गए ताजिये बड़ी ही आकर्षक होते हैं।
विज्ञापन
2 of 5
ताजिया
- फोटो : amar ujala
इमाम हुसैन की मातमी सदाओं से पूरा जिला गमगीन है। इमाम की याद में लोगों ने बड़े-बड़े ताजिए बनाकर चौक पर रखे हैं। नौहाख्वानी, सीनाजनी तथा जंजीरी मातम कर काले लिबास में लोग इमाम हुसैन को याद कर रहे हैं।
विज्ञापन
3 of 5
ताजिया
- फोटो : amar ujala
उतरौला नगर में मोहर्रम कुछ मायनों में खास है। यहां पर शिया समुदाय के लोग जंजीरी व आग का मातम कर इमाम हुसैन को याद करते हैं। देश-विदेश में रहने वाले शिया परिवार के लोग भी मोहर्रम में वतन वापस लौटते हैं और चेहल्लुम तक यहीं रहकर इमाम हुसैन का मातम मनाते हैं।
4 of 5
ताजिया
- फोटो : amar ujala
यही नहीं, करीब आठ दशक पूर्व यहां का मोहर्रम गंगा-जमुनी तहजीब पेश करता था। मुसलमान हो या हिंदू सभी समुदायों के लोग मोहर्रम में इमाम हुसैन को याद कर उनके बताए आदर्शों पर चलने का संकल्प लेते थे। वक्त के साथ थोड़ा बदलाव जरूर आया है लेकिन आज भी यहां का मोहर्रम बहुत ही खास होता है।
दसवीं मोहर्रम को शाम के समय तरह-तरह के ताजिया नगर के वीर विनय चौराहे पर इकट्ठा है। अलम का जुलूस भी निकाला जाता है। देर रात तक ताजिओं को कर्बला में दफन कर दिया जाता है। पचपेड़वा, तुलसीपुर, मथुरा बाजार तथा सादुल्लाहनगर आदि जगहों मे भी मोहर्रम बड़े गमगीन माहौल मे मनाया जाता है। बलरामपुर के बने ताजिये मुंबई, कोलकाता व अन्य शहरों मे भेजे जाते हैं।