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बेटे का मुंडन कराने के लिए फोड़ी गुल्लक किया चंदा

Mon, 02 Jan 2017 03:37 PM IST
ब्यूरो/अमरउजाला, लखनऊ
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नोटबंदी - फोटो : amar ujala
आठ नवंबर को लागू नोटबंदी ने लोगों की रोजमर्रा के साथ-साथ खास मौके की खुशियों को छीन लिया। हालांकि अब लोग मान रहे हैं कि पहले से स्थिति सुधर रही है। छोटे नोट के अलावा कार्ड से भुगतान का चलन लोगों को नोटबंदी के बाद कैश की कमी से पैदा हुई समस्या से बचा रहा है। नोटबंदी को लेकर राजधानी के लोगों का क्या सोचना है, इस बारे में अमर उजाला ने उनसे बातचीत की। लोगों ने नोटबंदी को तो सही ठहराया, लेकिन उनका कहना है कि केंद्र सरकार को लोगों को असुविधा से बचाने के लिए कई उपाय करने होंगे। 
 
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अमित वर्मा व उनका पर‌िवार - फोटो : amar ujala
बेटे का मुंडन कराने के ल‌िए क‌िया चंदा
परिवार- अमित वर्मा, ज्योति, चंद्रकली, रामअवतार और पार्थ।
असर - फार्मा कंपनी में सेल्स एग्जीक्यूटिव और पारा निवासी अमित वर्मा का कहना है कि 14 नवंबर को मेरे बेटे पार्थ का मुंडन संस्कार था। सेल्स टीम में होने के कारण कुछ छोटे नोट घर में रखे थे। इसके अलावा घर की गुल्लक तोड़ी, जिसमें भी करीब 4500 रुपये के छोटे नोट मिल गए। रिश्तेदारों से भी कुछ पैसा मांगा गया। बैंक और एटीएम से कुछ पैसा निकाला। कुछ दिन बाद ही चचेरी बहन की शादी भी थी। इसमें भी हमने रिश्तेदारों से कलेक्शन करके खर्चे पूरे किए। कुछ खर्च डेबिट और क्रेडिट कार्ड से भुगतान से किए गए।
50 दिन के बाद - बैंकों में भीड़ कम हुई है। एटीएम और बैंक दोनों जगह से जरूरी पैसा नहीं मिल पा रहा है।
फैसला कैसा? - अच्छा है। भ्रष्टाचार खत्म होगा तो भविष्य में फायदे मिलेंगे।
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तनुज गौतम व उनका प‌र‌िवार - फोटो : amar ujala
रोजमर्रा के खर्च भी पूरा करना मुश्किल हुआ
परिवार- तनुज गौतम, ऋतु और वान्या।
असर - एक निजी अस्पताल में मार्केटिंग मैनेजर तनुज गौतम का कहना है कि आठ नवंबर के बाद बैंक और एटीएम दोनों जगह से भुगतान मिलना बंद हो गया। कुछ दिन बाद एटीएम से जो पैसा मिला, वह भी 2,000 के नोट के रूप में था। इससे भी घर के खर्च का सामान जैसे सब्जी, दूध, ब्रेड खरीदने के लिए भुगतान नहीं हो पा रहा था। एडवांस सैलरी केलिए कोशिश की, पर छोटे नोट में भुगतान के लिए उन्होंने भी मना कर दिया। पूरे महीने कैश की कमी झेलनी पड़ी। हालात ऐसे थे कि बेटी की पढ़ाई से जुड़े खर्च भी मुश्किल से पूरे कर पा रहे थे।
50 दिन के बाद - अभी भी एटीएम से पैसा नहीं निकल पा रहा है। कुछ एटीएम में पैसा है भी तो 2,000 रुपये के नोट ही निकल रहे हैं, पर बैंक से छोटे नोट मिलने से राहत मिली।
फैसला कैसा? - अच्छा। केंद्र सरकार को केवल अब छोटे और 500 रुपये केनोट की उपलब्धता सुनिश्चित करनी चाहिए। 

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राम इकबाल स‌िंह व पर‌िवार - फोटो : amar ujala
बच्चों के सर्दी के कपड़े तक नहीं खरीद पाए
परिवार- राम इकबाल सिंह, इशिता सिंह, नैतिक व पारस।
असर - गोमतीनगर निवासी और पेशे से इलैक्ट्रिकल इंजीनियर राम इकबाल सिंह का कहना है कि फैसला ऐसे समय आया जब बच्चों के लिए सबसे जरूरी सर्दी के कपड़े खरीदने होते हैं। अब जब कैश पास में नहीं था। बैंक, एटीएम से निकाल नहीं पा रहे थे। ऐसे में दो विकल्प थे कि शोरूम से महंगे ब्रांडेड कपड़े खरीदो। या खरीददारी ही नहीं करो। ऐसे में गर्म कपड़े खरीदने की योजना ही टालनी पड़ी। रोजमर्रा केखर्चे भी कम से कम करके पूरे किए गए। अचानक से बड़े नोट बंद हो गए थे तो कोई भी काम पूरे नहीं कर पा रहे थे।
50 दिन के बाद -  स्थिति सुधर रही है। पैसा बैंक से मिल पा रहा है। प्राइवेट बैंक में भीड़ कम हो गई है। एटीएम में अब भी हालत बुरी है। इसे सुधारें।
फैसला कैसा? - अच्छा। कैशलेस होने से अर्थव्यवस्था ही सुधरेगी।
 
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डॉ. शिवआसरे सिंह व उनका प‌र‌िवार - फोटो : amar ujala
मकान की मरम्मत का काम टला
परिवार- डॉ. शिवआसरे सिंह, जया सिंह, कृष्णा, प्रज्ञा सिंह।
असर - सेल्स टैक्स विभाग में डिप्टी डायरेक्टर और इंदिरानगर निवासी डॉ. शिव आसरे सिंह का कहना है कि मैं नौकरी पेशा हूं, पत्नी भी एक छोटा बिजनेस करती हैं। डेबिट और क्रेडिट कार्ड के कारण परेशानी नहीं हुई। नोटबंदी के बाद डेबिट कार्ड से ही भुगतान किया। हालांकि एक बड़ा काम कैश नहीं होने की वजह से नहीं करा पाए। वह मकान की मरम्मत थी। चेक से लेबर का भुगतान नहीं हो पा रहा था। अब इसे हालात सुधरने के बाद कराएंगे।
50 दिन के बाद - स्थिति सुधरी है। अब बैंक में आसानी से पैसा मिल पा रहा है। हमारे विभाग में भी टैक्स कलेक्शन अभी भी कम हो पा रहा है।
फैसला कैसा? - अच्छा। अगर इसके दूरगामी फायदे देखें तो सबसे ज्यादा फायदा नौकरी पेशा को ही होने वाला है।
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अमनप्रीत सिंह व उनका प‌र‌िवार - फोटो : amar ujala
बेटे की शादी में ही नहीं कर पाया खर्च
परिवार- अमनप्रीत सिंह, नवनीत कौर, गुरप्रीत कौर, सतपाल सिंह मीत।
असर - नाका निवासी सतपाल सिंह मीत का कहना है कि नोटबंदी के बाद पांच छह दिन तो कु छ समझ ही नहीं आया कि क्या करें? शादी के लिए रखी रकम भी बड़े नोट में थी। 27-28 नवंबर को बेटे अमनप्रीत सिंह की शादी थी। बैंक में भी लाइन लगी थी। किसी तरह से जितना पैसा जुटाया गया, उतने में ही खर्च पूरे किए। शादी के इंतजाम में कटौती की। उधार में कुछ काम कराए। इनका अभी तक भुगतान कर रहे हैं। नोटबंदी के फैसले से परेशानी हुई। लाइफ-टाइम का एक मौका था। वह भी कटौती से पूरा किया।
50 दिन के बाद - सुधार अभी 20 प्रतिशत तक है। जब तक बैंकों से निकासी की लिमिट खत्म नहीं होती, व्यापार और घर नहीं चल सकते। 
फैसला कैसा? - बुरा। परिवार और व्यापार दोनों का खर्च चलाना मुश्किल हो गया है।
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