कड़ाके की ठंड से आम जनजीवन तो प्रभावित है ही, हांड़ कंपांऊ ठंड से मंदिरों के गर्भगृह में विराजमान भगवान भी अछूते नहीं हैं। मंदिरों में विराजमान विग्रह को भी ठंड से बचाने के यत्न हो रहे हैं। श्रृंगार से राग-भोग व आरती में भगवान को ठंड से बचाए रखने के लिए ऊनी कपड़े, गर्म भोज्य पदार्थ व अंगीठी तक तापने के लिए रखी जा रही है।
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बजरंगबली की प्रधानतम पीठ हनुमानगढ़ी में विराजमान बजरंगबली को रजाई की ओट में रखा जा रहा है। पुजारी रमेश दास के अनुसार यूं तो हनुमान जी त्रिगुणातीत हैं लेकिन भक्तों पर कृपा हेतु वे प्रकृतिगत हैं। इसी भाव से जब गर्मी पड़ती है तो उन्हें फुहारा, फूल-बंगला आदि से आच्छादित किया जाता है और जब सर्दी पड़ती है तो उन्हें गर्म कपड़े पहनाए जाते हैं और मोटे गद्दे एवं मखमल की रजाई में रखा जाता है।
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रसिक परंपरा में आराध्य के प्रति कुछ और भाव अर्पित है, इसकी तस्दीक सरयू तट पर स्थित प्रसिद्ध पीठ सियाराम किला झुनकीघाट से होती है। यहां विराजमान रसिकेंद्र बिहारी को कुछ अन्य मंदिरों की तरह अगहन शुक्ल पंचमी से बसंत पंचमी तक मखमल की रजाई ओढ़ाई जाती है। इन दिनों पारा अधिक गिर जाने पर उन्हें अंगीठी तपाई जा रही है।
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सियाराम किला के महंत करुणानिधान शरण के अनुसार साधक के लिए आराध्य वैसे ही हैं जैसे कि वह, इसलिए ठंड से बचने के लिए हमें जैसे जरूरत पड़ती है, वैसी हम पहले रसिकेंद्र बिहारी को प्रस्तुत करते हैं। बिड़ला मंदिर में महाराज एवं महारानी के रूप में विराजमान राम-सीता के विग्रह को आचमन तक गर्म पानी से कराया जाता है।
मंदिर के प्रबंधक पवन सिंह के अनुसार अगहन शुक्ल पंचमी से बसंत पंचमी तक यहां भगवान के लिए मखमली रजाई एवं ऊनी वस्त्र के साथ बिड़ला सरकार को श्रृंगार से भोग व आरती में विशेष सतर्कता बरती जाती है। इन कुछ चुनिंदा मंदिरों के अलावा वैष्णव धारा के श्रीराम बल्लभाकुंज, नेपाली मंदिर, राम जानकी मंदिर गोलाघाट आदि सभी मंदिरों में यथा शक्ति तथा भक्ति के हिसाब से विग्रह को ठंडी से बचाने का यत्न देखने को मिल रहा है।