निर्भया कांड को सोमवार को सात साल पूरे हो जाएंगे। लेकिन लखनऊ में अब तक महिलाओं के लिए सिटी बस में सुरक्षित सफर के इंतजाम नहीं हो सके हैं। महिला सुरक्षा को लेकर सेफ सिटी योजना में जो प्रोजेक्ट बने थे वह जहां के तहां पड़े हैं। जबकि सिटी बसों में व्हीकल ट्रैकिंग सिस्टम (वीटीएस), सीसीटीवी और पैनिक बटन लगाए जाने का काम कराया जाना प्रस्तावित था। इस कार्य पर करीब सात करोड़ रुपये खर्च होंगे। केंद्र से मिला बजट पुलिस के पास है और कार्य सिटी ट्रांसपोर्ट कंपनी को नगर निगम की सलाह पर करना है मगर पैसा न मिलने से इस कार्य की शुरुआत नहीं हो सकी। केंद्र सरकार ने दिल्ली के निर्भया कांड के बाद महिलाओं और लड़कियों की सुरक्षा के लिए शहर को सुरक्षित बनाने के लिए सेफ सिटी योजना शुरू की है। इसके लिए 194 करोड़ रुपए का बजट भी जारी किया जा चुका है। यह योजना शहरी मंत्रालय, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के परामर्श से शुरू की गई। लखनऊ को सेफ सिटी बनाने की योजना को अमल लाने की जिम्मेदारी उत्तर प्रदेश पुलिस को दी गई है।
खर्च होंगे 505.95 करोड़
सेफ सिटी योजना के तहत बसों में सीसीटीवी, वीटीएस और पैनिक बटन लगाए जाने के सुरक्षा उपकरण तीन साल तक संचालन पर 505.95 करोड़ रुपये खर्च होंगे। इसकी मांग लखनऊ सिटी ट्रांसपोर्ट सर्विसेज के प्रबंधन निदेशक की ओर से गृह विभाग से की गई है।
कमांड कंट्रोल सेंटर से जुड़ेगा सिस्टम
लखनऊ सिटी ट्रांसपोर्ट की बसों में लगने वाली वीटीएस, सीसीटीवी और पैनिक बटन के सिक्योरिटी सिस्टम पुलिस कंट्रोल रूम के अलावा स्मार्ट सिटी योजना में बनाए गए इंटीग्रेटेड कमांड कंट्रोल सेंटर से जोड़ा जाएगा।
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सौम्या
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लोग सोच बदलें लोग तब हो सुधार
मैं टैक्सी या कैब से विश्वविद्यालय जाती हूं। सुरक्षा के तमाम दावों व वादों के बाद भी मन में डर बना रहता है। हर दिन कोई न कोई ऐसी घटना हो रही है, जिससे डर और बढ़ जाता है। मेरी सहेलियों ने भी बताया था कि एक बार उन्हें टैक्सी वाले की वजह से काफी परेशानी हुई। इसके बाद मैं अपनी सुरक्षा के लिए कुछ न कुछ साथ लेकर चलती हूं। परिसर में कोई डर नहीं है। परिसर से बाहर अब भी लोगों की मानसिकता महिलाओं व लड़कियों को लेकर 50 फीसदी ही बदली है। आज भी अगर कोई लड़की छोटे कपड़े पहन ले या रात में बाहर निकल जाए तो उसे लेकर लोग तरह-तरह की बातें करेंगे जबकि यह उसकी व्यक्तिगत पसंद है। इस पर बात करने से अच्छा है कि ऐसे लोग अपनी सोच बदलें, तभी अपेक्षित सुधार होगा। - सौम्या अवस्थी, एमजेएमसी, बीबीएयू
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तृप्ति भारती
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पब्लिक ट्रांसपोर्ट में नहीं सुरक्षित
कहने को तो पब्लिक ट्रांसपोर्ट में लड़कियों व महिलाओं के सफर को सुरक्षित बनाया जा रहा है। मगर, सरकारी तंत्र रात में ऑटो, टेम्पो या बस से यात्रा कर ले तो हकीकत से रूबरू हो जाएगा। सीट पर बैठने के बहाने तो कभी उतरने के बहाने, लोगों के मन का मैल सामने आ जाता है। अलार्म, पिंक बसें और ऐसी ही कवायदें करने से घटनाएं कम तो हो सकती हैं, पर पूरी तरह अंकुश तब ही लग पाएगा, जब लोगों की सोच में परिवर्तन आए। इसके लिए जरूरी है कि स्कूली स्तर से ही बच्चों को महिलाओं की इज्जत करने का सबक सिखाया जाना चाहिए। -तृप्ति भारती, नर्सिंग छात्रा, केजीएमयू
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मनुप्रिया
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सफर के लिए मेट्रो है सबसे सुरक्षित
लखनऊ में पिछले सालों की तुलना में स्थितियां बेहतर हुई हैं। मेट्रो जहां पब्लिक ट्र्रांसपोर्ट के रूप में सुरक्षित माध्यम बना है। लेकिन यह अभी एक रूट तक ही सीमित है। इसे दूसरे इलाकों तक भी ले जाना चाहिए। मैं पब्लिक ट्रांसपोर्ट के लिए इसी को प्राथमिकता देती हूं। सिटी बस या ऑटो में सफर करने में सुरक्षा के लिए अब भी भरोसा नहीं है। इनके उपयोग की जगह मुझे कैब से ही ऑफिस या मार्केट जाना सुरक्षित लगता है। पुलिस को भी महिलाओं को सुरक्षित होने का भरोसा दिलाना होगा। इसके लिए जरूरी है कि कड़े कदम महिलाओं के साथ अपराध होने पर उठाने होंगे। इन अपराध को होने से रोकने के लिए भी पुलिस और प्रशासन को काम करना होगा। - मनुप्रिया, कामकाजी महिला, गोमतीनगर
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काजल
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सिटी बस, ऑटो में सफर करने में लगता भय
ऑटो, सिटी बस आदि में सफर करने में भय महसूस होता है। पर, मजबूरी के चलते आवागमन करना पड़ता है। आए दिन महिलाओं के साथ अभद्रता की घटनाएं सुनने को मिलती हैं। इसके बाद भी महिलाओं को सुरक्षित सफर की गारंटी नहीं है। सिटी बस में सुरक्षा मिलना तो बहुत दूर महिला सीट पर पुरुष डटे नजर आते और कंडक्टर उनको हटाने की हिम्मत नहीं कर सकता। सिटी बस महिलाओं एवं छात्राओं के लिए सुरक्षित सखी बस सेवा का शुभारंभ किया था। सखी बस सेवा भी अव्यवस्था की भेंट चढ़ गई। ऐसे भारी तादाद में छात्राएं जिनके पास खुद के सफर का साधन नही है। वह तो सिटी बस एवं ऑटो के जरिये ही आवागमन करती हैं। लेकिन सफर के दौरान बहुत ही एहतियात बरतना पड़ता है। - काजल, परास्नातक छात्रा
नहीं छूट रही सार्वजनिक वाहनों में महिलाओं से करीब बैठने की आदत
घर से कार्यस्थल तक तो जाने केलिए निजी वाहन ही प्रयोग करती हूं। लेकिन बाजार, शॉपिंग या अन्य कामों के लिए पार्किंग की किचकिच से बचने को सार्वजनिक वाहनों का प्रयोग ही रहता है। बताते हुए गुस्सा आ रहा है कि महिलाओं से पुरुषों की सटकर बैठने की घटिया सोच उनसे छूट नहीं पा रही है। सब एक जैसे नहीं होते हैं, लेकिन कई बार मेरा खुद का अनुभव है कि महिला को बस की सीट पर या ऑटो की सीट पर वे सटकर करीब बैठने को उतावले दिखते हैं। बस में कई बार देखती हूं कि सीट पर कोई बैठा हो या खड़ा हो तो उसके करीब सटकर खड़े दिखते हैं। हाल ही में एक ट्रेन और बस की यात्रा में तो मुझे बकायदा ऐसे लोगों को फटकारना पड़ा। पुलिस की सक्रियता हो, मीडिया में व सार्वजनिक मंचों पर चर्चाएं होनी चाहिए। लोगों की सोच में बदलाव आ रहा है। लोग महिलाओं व बेटियों को सम्मान देते भी दिखते हैं। - डॉ. किरन सिंह, लेखिका एवं शिक्षिका।