फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

केजीएयू में शुरू हुआ नया प्रयोग, मरीज के दांतों को पीसकर बनाई जबड़े की हड्डी

Mon, 17 Feb 2020 11:02 AM IST
ishwar ashish न्यूज डेस्क/अमर उजाला, लखनऊ
विज्ञापन
1 of 5
पहले और अब महिला के दांतों की स्थिति - फोटो : अमर उजाला
केस - 01
कानपुर निवासी सुरैया (परिवर्तित नाम) के आगे के दांत हिल रहे थे और उसके दांत काफी आगे की तरफ निकल आए थे। इससे उसे खाने-पीने में दिक्कत हो रही थी। साथ ही उसका चेहरा भी खराब लग रहा था। वह केजीएमयू आई तो यहां जांच में बता चला कि उसकी जबड़े की बोन (हड्डी) ही नहीं है। यहां उसके दांतों को निकाल कर उसकी पिसाई की गई। फिर उसमें कुछ पदार्थ मिलाकर लुगदी तैयार की और इससे जबड़े की हड्डी बनाई गई। इस हड्डी को प्रत्यारोपित करने के बाद उस पर आर्टिफिशियल दांत लगा दिए गए। अब उसकी समस्या खत्म हो गई है और चेहरा खूबसूरत हो गया है।
केस -02
बाराबंकी निवासी विमलेंद्र (परिवर्तित नाम) के दांत खाना खाते वक्त हिलते रहते थे। उसे कुछ समय पहले पायरिया हुआ था। इससे उसके दांतों की जड़ों में रहने वाली हड्डी खत्म हो गईं। ब्रश करने में भी दिक्कत होती थी। केजीएमयू आने के बाद उसके दांतों को निकाल कर उनकी पिसाई की गई और फिर उससे गले हिस्से में जबड़ा बनाया गया। अब उसे नए दांत लगाए गए हैं। इससे विमलेंद्र के चेहरे का टेढ़ापन भी दूर हो गया है।

जिन मरीजों के जबड़े की हड्डी नहीं है, केजीएमयू में उसे दांतों से बनाया जा रहा है। यह सस्ता होने के साथ ही संक्रमणरोधी भी है। इससे मरीज को किसी तरह की दिक्कत नहीं होगी।
विज्ञापन

2 of 5
डॉ लक्ष्य यादव - फोटो : अमर उजाला
जबड़े की हड्डी दुरुस्त होने से चेहरे के हिसाब से दांतों को डिजाइन कर लगाया जा रहा है। इससे मरीज की खाने-पीने की समस्या खत्म हो जाती है। साथ ही चेहरा भी बेहतर लगने लगता है। विभाग में इसकी शुरुआत हो गई है। अभी दो मरीजों पर यह प्रयोग पूरी तरह से सफल रहा है। पायरिया होने पर तमाम लोगों के जबड़े की हड्डी गल जाती है। इसी तरह दुर्घटना होने पर भी जबड़ा टूट जाता है। ऐसी स्थिति में इस हड्डी की जगह प्लेट लगाई जाती है। कई बार जांघ या चेस्ट से हड्डी निकालकर उसकी ग्राफ्टिंग कर प्रत्यारोपित किया जाता है। लेकिन अब यह समस्या खत्म हो गई है। डेंटिंग ग्राइंडर केजरिए दांतों से ही जबड़े की हड्डी बनाई जा रही है। फिर इसे जिस स्थान पर जबड़े की हड्डी नहीं है वहां प्रत्यारोपित कर उस पर आर्टिफिशियल दांत लगाए जा रहे हैं। प्रोस्थोडॉटिक्स विभाग के एडिशनल प्रोफेसर डॉ. लक्ष्य कुमार यादव ने बताया कि विभाग में डेंटिंग ग्राइंडर मशीन लाई गई है। इससे मरीजों की बोन ग्राफ्टिंग आसान हो गई है। उखाड़े गए दांतों को विसंक्रमित किया जाता है। इसे ग्राइंडर में पीस कर उसमें सॉल्यूशन मिलाकर लुगदी बनाई जाती है। इसके बाद उससे जबड़े की हड्डी तैयार की जाती है।
 
विज्ञापन

3 of 5
पहले दांतों की स्थिति - फोटो : अमर उजाला
डॉ. लक्ष्य कुमार यादव ने बताया कि यदि किसी के दांत हिल रहे हों, जड़ से छोड़ रहे हों। खाने-पीने में दिक्कत हो गई हो। दांत की वजह से चेहरा कुरूप लगने लगा हो। कीड़े लगने की वजह से जबड़े की हड्डी गल गई हो तो उसमें प्रत्यारोपण की जरूरत पड़ती है। इस तकनीक से जबड़े की हड्डी बनाने से किसी तरह का रिएक्शन नहीं होता है। छोटा चीरा और टांका लगाने से ज्यादा दवाएं नहीं खानी पड़ती हैं।

 

4 of 5
बाद में दांतों की स्थिति - फोटो : अमर उजाला
यह होगा फायदा
डॉ. लक्ष्य कुमार यादव ने बताया कि जबड़े की हड्डी न होने पर उसे जांघ या चेस्ट से निकाला जाता है। फिर उसकी ग्राफ्टिंग कर साइज का मिलान किया जाता है। फिट करने के लिए जबड़े में बड़ा चीरा लगाना पड़ता है, लेकिन अब दांतों की पिसाई कर जबड़े की हड्डी बनाने से शरीर के दूसरे हिस्से में सर्जरी नहीं करनी पड़ेगी। जब नाप-जोख कर हड्डी बनाई जाएगी तो उसे प्रत्यारोपित करने में भी बड़ी सर्जरी नहीं होगी। इसी तरह जब संबंधित व्यक्ति के दांतों की हड्डी बनेगी तो शरीर में उसकी स्वीकार्यता रहेगी। किसी तरह का रिएक्शन होने की आशंका नहीं रहती है।
विज्ञापन
विज्ञापन

5 of 5
प्रतीकात्मक तस्वीर
सिर्फ ग्राइंडर का दाम देता है मरीज
अभी तक जबड़े की हड्डी तैयार करने में करीब 50 हजार से एक लाख तक खर्च हो जाता है। लेकिन अब सिर्फ तीन हजार का ग्राइंडर खरीदना पड़ता है। मरीज इस ग्राइंडर को अपने पास रखता है। यदि उसके जबड़े के किसी दूूसरे हिस्से में समस्या होती है और वहां हड्डी बनाने की जरूरत पड़ी तो इसी ग्राइंडर का इस्तेमाल किया जा सकेगा।

 
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें