आज पूरी दुनिया महिलाओं के हक में माहौल बनाने को तमाम आंदोलन छेड़े हुए हैं। बदलाव की कोशिशों के बीच डॉ. कल्बे सादिक लखनऊ की सरजमीं पर एक ऐसा नाम रहा, जिसने शिक्षा को बेटियों की बेहतरी के लिए एकमात्र मुफीद जरिया बताया। लखनऊ में यूनिटी कॉलेज की स्थापना करके उन्होंने तालीम को लेकर अपनी कोशिशों को जमीन पर उतारा। यह स्कूल सभी वर्ग व धर्म के बच्चों के लिए खोला गया। इसी विद्यालय के एक हिस्से में उन्होंने ऐसी व्यवस्था की, जहां वंचित तबके के बच्चे निशुल्क शिक्षा हासिल करते हैं।
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डॉ कल्बे सादिक
- फोटो : अमर उजाला
उनका कहना था कि डिग्री इसलिए नहीं कि सिर्फ पढ़ना है, बल्कि इसलिए जरूरी है कि लड़कियां अपनी सामर्थ्य को पहचान सकें। उनके निधन से देश-दुनिया ने बेटियों की तालीम के हिमायती, महिला हक के पैरोकार और रूढ़ियों के सख्त खिलाफ एक रहनुमा, एक सरपरस्त को खो दिया है।
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शाइस्ता अंबर
- फोटो : अमर उजाला
उनकी तालीमों से मिली महिला हक अभियान को धार
अक्सर सभा, सम्मेलनों में उनसे मुलाकात हो जाती थी। उनके घर भी कई बार जाना हुआ। महिलाओं पर अन्याय के खिलाफ लड़ाई लड़ते-लड़ते जब कभी खुद को हारा हुआ महसूस करती तो एक रहनुमा की तरह वो सामने खड़े नजर आते थे। डॉक्टर कल्बे सादिक कहते थे कि जिस राह पर तुम चल रही हो, वहां तुमको उलझाने वाले ज्यादा मिलेंगे, पर तुम अपने दिल की सुनना। धर्म व्यक्तिगत आस्था की बात है, न्याय की लड़ाई अपनी जगह है। कुरान पाक के बतलाए रास्तों पर चलना। तलाक देने के मुस्लिम रिवाज को उन्होंने घर तबाह करने वाला बताया। कहते थे कि इस तरह के तलाक कानून के खिलाफ हैं। कभी उन्होंने नाम लिया ही नहीं, हमेशा कहते- बीबी तुम गलत नहीं। - शाइस्ता अंबर, अध्यक्ष, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड
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प्रो. साबरा हबीब
- फोटो : अमर उजाला
कहते थे, तालीम इसलिए नहीं कि अच्छे लड़के से शादी हो
उनका जाना मेरा व्यक्तिगत नुकसान है। वो धर्म की सीमाओं से परे थे। बेटियों की तालीम उनके लिए सबसे बढ़कर थी। रूढ़िवादिता के खिलाफ थे। वे कहते थे कि बेटियों की तालीम इसलिए नहीं कि पढ़ लिख लेने से उनकी अच्छे घर में शादी हो जाएगी, बल्कि इसलिए कि बेटियों की अपनी पहचान हो। इससे उनके दिमाग के रास्ते खुलेंगे और अपनी क्षमताओं को पहचान सकेंगी। कहते थे कि बेटियों तालीम हासिल करो, अपनी क्षमता को बढ़ाते हुए दूसरों को आगे बढ़ाने में अपना योगदान दो। इसके अलावा उनका सेंस ऑफ ह्यूमर गजब का था। उन्हें कभी जोर से बोलते नहीं सुना, लेकिन उनकी कही बात गहरा असर छोड़ती थी। - प्रो. साबरा हबीब, शिक्षाविद्
कम्यूनिटी के विकास के लिए हमेशा काम किया
उनकी बातों के वैज्ञानिक और तार्किक आधार होते थे। अलीगढ़ में भी मदीनतुल उलूम एजुकेशनल सोसाइटी की स्थापना की है। वहां फूफीजाद भाई के घर पर उनसे मुलाकात हुई। इसके अलावा लखनऊ में आयोजनों में मुलाकात होती थी। इल्म हासिल करना ही काफी नहीं, उसे आगे कैसे बढ़ाना है, इस पर उनका जोर था। उनके द्वारा खोले गए शिक्षा संस्थान इसका प्रमाण है कि वे शिक्षा खासकर बेटियों की पढ़ाई को लेकर प्रगतिशील सोच थे। स्मार्ट क्लास, अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए व्यवस्थाएं करके उन्होंने हमेशा कम्यूनिटी और वंचित तबके के लिए काम किया। - ताहिरा हसन, सामाजिक कार्यकर्ता