नम आखों से सिसकियां भरते हुए अजादार मुहुर्रम के शाही जुलूस में शामिल हुए। लखनऊ में मुर्हरम के जुलूस की खास तस्वीरें...
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सिसिकियां भरते हुए इस जुलूस में शामिल हुए लोग, तस्वीरें...
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...ऐ मोमिनों हुसैन से मकतल करीब है,...मुजरई खल्क ने इन आंखों ने क्या क्या देखा, मर्सिया के साथ स्याह माहौल में गुरुवार को मोम की शाही जरीह का परंपरागत जुलूस बड़े इमामबाड़े से छोटे इमामबाड़े तक निकाला गया।
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इस शाही जुलूस के साथ ही करबला में हजरत इमाम हुसैन व उनके 72 साथियों की शहादत का गम ताजा हो गया, अजादार सिसकियां भरते गम-ए-हुसैन में शरीक हुए।
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इस दौरान जिला प्रशासन व पुलिस प्रशासन मुस्तैद रहा। जुलूस मार्ग में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए थे।
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स्याह माहौल और गम में डूबे अजादारों के बीच शाम पांच बजे मोम की शाही जरीह के इस जुलूस में नवाबी परम्परा के सभी साजो सामान शामिल थे।
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जुलूस में शाही बाजा, रौशन चौकी से गूंजती मातमी शहनाई, शाही निशान लिए हाथी, ऊंट का कारवां आगे आगे चल रहा था। इसके पीछे मातमी बैंड हुसैन का गम मना रहे थे।
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इसी के साथ हजरत इमाम हुसैन की सवारी दुलदुल, हजरत अब्बास का अलम और छह माह के मासूम अली असगर का झूला भी शोकाकुल अजादारों को रोने के लिए बेकरार कर रहा था।
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अजादार-ए-हुसैनी करबला के शहीदों को पुरसा देने के लिए जगह-जगह जमा थे। जुलूस के साथ चल रहे सोजख्वान मर्सिया पढ़ रहे थे...जब करबला में दाखिलाए शहेदीं हुआ दस्ते बला नमूनाए कुल्लेबरी हुआ,...ऐ मोमिनों हुसैन से मकतल करीब है,...मुजरई खल्क ने इन आंखों ने क्या क्या देखा, इसे सुन कर अजादार रो रहे थे।
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वहीं जुलूस में अंजुमन शब्बीरिया के मातमदार नौहा पढ़ रहे थे ...ये कहते थे शहेवाला सकीना हम नहीं होंगे, नौहा सुन अजादार ए हुसैन के मुंह से बस या हुसैन की सदाएं निकल रहीं थीं और आंखें नम थी। जुलूस से पहले आसिफी इमामबाडे़ में एक मजलिस हुई।