बैंड व शहनाई पर नौहों की मातमी धुन के साथ सोमवार को पहली मोहर्रम की रात आसिफी इमामबाड़े से परंपरागत अंदाज में मोम की जरीह का जुलूस निकाला गया। हुसैनाबाद ट्रस्ट की ओर से निकाला गया जुलूस इमामबाड़े से निकलकर रूमी गेट, पावर हाउस, घंटाघर होते हुए देर रात छोटे इमामबाड़े पहुंचा।
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मुहर्रम
- फोटो : amar ujala
जुलूस के दौरान बैंड व शहनाई पर नौहों की मातमी धुनें माहौल को गमगीन बना रहीं थीं। जुलूस में शामिल अजादार नम आंखों से अलम-ए-मुबारक और झूले अली असगर को चूम रहे थे और मोम की शाही जरीह की जियारत कर दुआएं मांग रहे थे।
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- फोटो : amar ujala
पीछे हाथियों और ऊंटों पर बच्चे हाथों में शाही चिन्ह चांद, सूरज, सुरजमुखी, मछली, शेर दहाड़ लिए हुए सवार थे। बीच में बच्चे हाथों में झंडियां लिए पैदल चल रहे थे तो उनके पीछे पीएसी और होमगार्ड के बैंड मातमी धुन बजाते माहौल को गमगीन कर रहे थे।
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- फोटो : amar ujala
साथ ही लोग चांदी के बल्लम, बरछी और मोर पंखी लिए हुए थे। जुलूस में मर्सियाख्वानी करते हुए चल सोजख्वान ने पढ़ा ....घर से जब बहरे सफर सैय्यदे आलम निकले, सर झुकाए हुए बा दीद-ए-पुरनम निकले, जिसे सुनकर अजादारों की आंखें नम हो रही थी। जुलूस में हजरत अब्बास की निशानी अलम शामिल था। पीछे स्याह लिबास में अजादार हाथों में अलम लेकर चल रहे थे।
जुलूस में इमाम हुसैन के छह माह के बेटे जनाबे अली असगर का गहवारा और इमाम हुसैन की सवारी का प्रतीक ज़ुलजनाह और ताबूत निकालेगे गए। इन निशानियों के बीच अंजुमन हाय मातमी शब्बीरिया नौहाख्वानी कर रही थी। जुलूस के आखिर में मोम की शाही जरी व अबरक की जरीह अजादारों के घिरी निकल रही थी, जिसे चूमने के लिए अज़ादार बेकरार थे। जुलूस में जायरीन, उलमा के अलावा जिला प्रशासन व पुलिस प्रशासन के अधिकारी मौके पर डटे रहे।