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Mother's day special: मैं दो नहीं, 10 हजार बच्चों की मां हूं, जानें- इनके बारे में

Sun, 13 May 2018 02:03 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
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मदर्स डे - फोटो : amar ujala
सदियां बीतीं...युग बदला...नहीं बदली तो बस मां। मां तपती धूप में बदली का अहसास है...। लड़खड़ाते कदमों को संबल देने का विश्वास है...। सुख हो या दुख, वही दिल के सबसे पास है...। मां, एक शब्द या रिश्ता ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया है। आज मदर्स-डे पर हमने बात की कुछ ऐसी माताओं से और जाना मातृत्व के महत्व और उसके अहसास को। मां-बच्चों के बीच प्यार, दुलार, ममता, करुणा, निश्छल व निस्वार्थ प्रेम में पिरोए इन्हीं अहसासों को पुष्पित करती रोली खन्ना की एक रिपोर्ट-

सिर्फ दो नहीं, मैं हूं 10 हजार बच्चों की मां
जैविक रूप से तो मेरी दो संतानें हैं श्वेता और माया। श्वेता, जो कि आयरलैंड में डॉक्टर है और दूसरी बेटी माया है, जो अंतरराष्ट्रीय कानून में अपनी पढ़ाई पूरी कर रही है। हां, जब बड़ी बेटी का जन्म होने का समय था, निश्चित तौर पर संपूर्ण होने का अहसास महसूस किया था मैंने। सच कहूं तो यह अहसास मुझे हर उस बार मिला, जब मैंने स्कूलों की नींव रखी। जब लोग मुझे मदर्स आफ स्कूल या 10 हजार बच्चों की मां कहते हैं तो अच्छा लगता है। आज भी जब स्कूल का अंतिम दिन होता है और छुट्टियां शुरू होती हैं, तो मेरी आंखें नम होती हैं, बच्चों के दूर जाने का अहसास होता है। स्कूल खुलने के समय लगता है कि बच्चे लौट आए और खुशियों को बयां करने को शब्द नहीं। एक औरत को मां कहलाने का हक ईश्वर ने क्यों दिया? इसलिए कि वह उसकी अमूल्य रचना है और एक बच्चे का भविष्य संवारने की क्षमता भी उसी में है।

डॉ. पदमा हरिहरन, फाउंडर प्रिंसिपल, संस्कृति स्कूल, लखनऊ
(फोटो में माया और श्वेता के साथ डॉ. पदमा हरिहरन)
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मदर्स डे - फोटो : amar ujala
बेहतर परवरिश देने की थी चुनौती
मैं कैसी मां हूं, कुछ मुश्किल है यह कह पाना। क्योंकि कामकाजी होने के कारण हमारी दिनचर्या थोड़ी हटकर रही। चूंकि पहले गर्भपात हो गया था, इसलिए नमन की पैदाइश के समय कुछ उत्साह कम सा था। नमन से मेरा लगाव उसके पैदा होने के बाद हुआ, ज्यों-ज्यों वो बढ़ता गया, हमारा रिश्ता कहीं ज्यादा गहरा होता गया। शायद पढ़ने वालों को हंसी आए, पर सच यही है कि घर के लोग अक्सर हंसा करते कि कैसे संभालेगी ये नमन को। उस वक्त मैं डीएम देहरादून बनीं थी। फिर पति को कोसोवो जाना था, मैं भी गई नमन को लेकर। पति बोले, घर के हेल्पर का भी टिकट कटाना पड़ेगा क्या? पर नहीं, वहां कुछ ज्यादा ही अच्छे से मैं देखभाल कर सकी और हम मां-बेटे और करीब आ गए। दरअसल मातृत्व की अनुभूति आपको स्वाभाविक तौर पर मजबूत कर देती है। खुश हूं बेटे को बेहतर परवरिश देकर।

निवेदिता शुक्ला, प्रमुख सचिव खाद्य एवं रसद
(फोटो - बेटे नमन के साथ आईएएस ऑफिसर निवेदिता)
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मदर्स डे - फोटो : amar ujala
सख्त अधिकारी, करुणामयी मां
ऊपर वाले की देन, संपूर्णता का अहसास है मातृत्व। यह अहसास मुझे तब हुआ जब 20 साल पहले मेरी बेटी का जन्म हुआ। ‘कम्पैशन ऑफ बुद्धा’ है मातृत्व। एक औरत के जीवन सफर में मां होने की जिम्मेदारी को निभाना कोई बलिदान या त्याग नहीं बल्कि यह हमारी तमाम ड्यूटी में से सबसे महत्वपूर्ण ड्यूटी है। एक मां बनकर एक औरत में विवेक, साहस और करूणा का जो संचार होता है, वह अंचभित करने वाला होता है। यहां आप खुद की तुलना किसी से नहीं कर सकते क्योंकि आपको अपने तरीके से अपनी औलाद की परवरिश करनी होती है। सभ्यता को आगे बढ़ाने के लिए ही ईश्वर ने औरत को यह नियामत बक्शी है। हां, जब हम मां बनते हैं, बच्चे को बड़ा कर रहे होते हैं तो इसमें योगदान पति, परिवार, दोस्त, नाते-रिश्तेदारों का भी होता है।

अंजु गुप्ता, एडीजी, वीमेन पावर लाइन
(फोटो में अंजु गुप्ता)

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मदर्स डे - फोटो : amar ujala
....और जीत गई एक मां
डॉक्टर कह चुके थे कि मैं मां नहीं बनूंगी कभी। 16-17 साल पहले न तो हमारे पास उतनी सुविधाएं थीं, न एडवांस टेक्नोलॉजी। कोई दबाव भी नहीं था, क्योंकि घर के लोगों ने मुझे कमी का अहसास ही नहीं होने दिया। पर मेरे अंदर पल रहा मातृत्व का अहसास मुझे हिम्मत हारने नहीं दे रहा था। हर दर पर शीश झुकाया, बड़ों का आशीर्वाद लिया। एक दिन चमत्कार हुआ और जीत गई मेरे अंदर की मां और हम इंतजार करने लगे उस पल का जब बड़ा बेटा प्रथम इस दुनिया में आया। फिर श्वेतांक ने जन्म लेकर हमारी फैमिली कम्प्लीट कर दी। सच कहूं तो प्रोफेशनल होने के कारण मेरी बाहरी व्यस्तताएं बहुत हैं, लेकिन मेरी पहली प्राथमिकता मेरे दोनों बेटे हैं। संडे का दिन उन्हीं के साथ बीतता है, चाहे कितना भी जरूरी काम क्यों न हो। सुबह साढ़े नौ बजे उनके स्कूल जो के बाद से मेरी दिनचर्या शुरू होती है और शाम 6.30 पर मैं बच्चों के साथ होती हूं।

मंजरी पांडेय, नृत्यांगना, संस्थापक, निदेशक मीफा इंस्टीट्यूट
(फोटो में प्रथम और श्वेतांक के साथ मंजरी पांडेय)
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मदर्स डे - फोटो : amar ujala
मैं हूं ‘खास’ बच्चे की खास मां
तीस साल पहले मेरे जीवन में खुशियों ने दस्तक दी और जन्म हुआ अंतरिक्ष का। पर नौ महीने के इंतजार के बाद जब प्रसव पीड़ा उभरीं तो पता चला कि बेटा साथ लेकर आया है, कई गंभीर बीमारियां। गंभीर हृदय रोग, तालू में छेद, कूल्हे की अविकसित हड्डी, एक पैर छोटा व ऑक्सीजन की कमी के चलते वह सामान्य बच्चों से अलग हो गया, खास हो गया। बहुत चुनौतीपूर्ण था यह सब, पर ईश्वर ने मुझे अंतरिक्ष के लिए चुना तो खास मकसद होगा। बस यही सोच कर मैंने खुद से वादा किया कि उसे सहज और सरल जीवन दूंगी। आज वह जिंदादिली से जिंदगी जी रहा। यह उसी की प्रेरणा है कि हम आशा ज्योति केंद्र स्कूल में विशेष बच्चों के जीवन को संवारने की कोशिश कर रहे हैं। हमारी कोशिश है कि तकनीकी प्रशिक्षण के जरिए हम खास बच्चों को आत्मनिर्भर बना सकें और अपने इस मकसद में लगातार हमें कामयाबी भी मिल रही है।

स्वाति शर्मा, प्रिंसिपल आशा ज्योति स्पेशल स्कूल
(फोटो में विशेष बच्चे अंतरिक्ष के साथ स्वाति शर्मा)
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मदर्स डे - फोटो : amar ujala
नहीं डिगा मां का विश्वास
फिल्मों  में देखा-सुना था मां बनने की पीड़ा, उसकी खुशियां। जब खुद मां बनने लगी तो मारे खौफ के बीमार पड़ गई। एक महीने तक तो बीमार रही, फिर धीरे-धीरे सब सामान्य हो गया। मैं भी बड़ी बेटी रिदमा के इस दुनिया में आने के लेकर अभ्यस्त हो गई। हालांकि, मेरी पढ़ाई चल रही थी, इस कारण कुछ तनाव में चली गई थी। कुछ दिक्कत हुई तो अल्ट्रासाउंड कराने पर डॉक्टर ने बताया कि हो सकता है कि आपकी बेटी कुछ अपंगता के साथ पैदा हो। यह सुनने के बाद मेरे अंदर की मां बैचेन हो उठी और खुद को भरोसा दिलाया कि हमारी बेटी के साथ कुछ गलत नहीं होगा। इस वक्त मुझे पहली बार मातृत्व की शक्ति का अहसास हुआ। मेरे अंदर एक ऊर्जा सी आ गई, जिसने बेटी के लिए सुरक्षा कवच का काम किया। नतीजा, हमारा विश्वास रंग लाया और बेटी एक सामान्य बच्चे की तरह दुनिया में आई। इसके बाद छोटी समृद्धा का जन्म होने से हमारी दुनिया पूरी हो गई।

डॉ. तूलिका साहू, शिक्षाविद्, भारत की प्रथम महिला डॉक्टरेट महिला फोटोग्राफर
(फोटो में रिदम और समृद्धि के साथ डॉ. तूलिका)
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लौट आई मौत के मुंह से
मेरे दो अनमोल रत्न है, गगन और विनायक। गगन के आने पर सबसे पहले मुझे पता चला था कि क्या होता है मां होने का अहसास। फिर विनायक के आने के बाद यह खुशनुमा अहसास मेरी ताकत बन गया। जरा सोचिए, आखिर औरत को ही ईश्वर ने अपने बाद सृजनकर्ता क्यों बनाया। निश्चित ही खास मकसद रहा होगा। यह विश्वास मेरा उस वक्त पुख्ता हो गया, जब 2010 में मैं मौत के मुंह से लौट आई। मुझे याद है कि मेरा बचना मुश्किल था, लेकिन मेरे कान में आवाज गूंजी कि ‘मां अभी तुम मरना मत....।’ बस बेटों के विश्वास की खातिर मैंने मौत को मात दी और खुद से वादा किया कि कुछ भी हो जाए, अपनी सेहत और स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह कभी नहीं रहूंगी। मां के रूप में मेरी चिंता रही कि वे बेहतर इंसान बने और खुश हूं कि उनका विश्वास अटूट है।

डॉ. शोभा मिश्रा, विभागाध्यक्ष, इतिहास, नवयुग कन्या महाविद्यालय
(फोटो में बेटे विनायक के साथ शोभा मिश्रा)
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