सदियां बीतीं...युग बदला...नहीं बदली तो बस मां। मां तपती धूप में बदली का अहसास है...। लड़खड़ाते कदमों को संबल देने का विश्वास है...। सुख हो या दुख, वही दिल के सबसे पास है...। मां, एक शब्द या रिश्ता ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया है। आज मदर्स-डे पर हमने बात की कुछ ऐसी माताओं से और जाना मातृत्व के महत्व और उसके अहसास को। मां-बच्चों के बीच प्यार, दुलार, ममता, करुणा, निश्छल व निस्वार्थ प्रेम में पिरोए इन्हीं अहसासों को पुष्पित करती रोली खन्ना की एक रिपोर्ट-
सिर्फ दो नहीं, मैं हूं 10 हजार बच्चों की मां
जैविक रूप से तो मेरी दो संतानें हैं श्वेता और माया। श्वेता, जो कि आयरलैंड में डॉक्टर है और दूसरी बेटी माया है, जो अंतरराष्ट्रीय कानून में अपनी पढ़ाई पूरी कर रही है। हां, जब बड़ी बेटी का जन्म होने का समय था, निश्चित तौर पर संपूर्ण होने का अहसास महसूस किया था मैंने। सच कहूं तो यह अहसास मुझे हर उस बार मिला, जब मैंने स्कूलों की नींव रखी। जब लोग मुझे मदर्स आफ स्कूल या 10 हजार बच्चों की मां कहते हैं तो अच्छा लगता है। आज भी जब स्कूल का अंतिम दिन होता है और छुट्टियां शुरू होती हैं, तो मेरी आंखें नम होती हैं, बच्चों के दूर जाने का अहसास होता है। स्कूल खुलने के समय लगता है कि बच्चे लौट आए और खुशियों को बयां करने को शब्द नहीं। एक औरत को मां कहलाने का हक ईश्वर ने क्यों दिया? इसलिए कि वह उसकी अमूल्य रचना है और एक बच्चे का भविष्य संवारने की क्षमता भी उसी में है।
डॉ. पदमा हरिहरन, फाउंडर प्रिंसिपल, संस्कृति स्कूल, लखनऊ
(फोटो में माया और श्वेता के साथ डॉ. पदमा हरिहरन)