हमेशा की तरह ही देश की सबसे प्रतिष्ठित परीक्षा में लखनऊ की प्रतिभा ने अपनी चमक बिखेरी। बिलाल को दसवीं रैंक मिली तो पति-पत्नी को एक साथ इस परीक्षा में सफलता मिली।
केजीएमसी से 2006 बैच के एमबीबीएस डॉ. योगेश सागर 2012 में एमबीबीएस पूरा कर दिल्ली गए और सिविल सेवा की तैयारी शुरू की। 2014 में वे आईआरएस में चयनित हुए और इनकम टैक्स विभाग मिला। 2015 में सेलेक्शन नहीं हुआ और 2016 में उन्हें 223वीं रैंक मिली। मूलत: बरेली के निवासी योगेश के पिता स्व. छोटेलाल कस्टम में सिपाही और मां रामेश्वरी देवी गृहिणी हैं।
उन्होंने गवर्नमेंट इंटर कॉलेज से साइंस में इंटर किया। उन्होंने बताया कि जब वह तैयारी के लिए दिल्ली गए तो काफी खर्च होता था। इसकी वजह से उन्हें प्राइवेट हॉस्पिटल में जॉब करनी पड़ी। कई बार धैर्य जवाब देता था और लगता था कि कोई छोटी-मोटी नौकरी करनी ही पड़ेगी। हालांकि मैने धैर्य बनाए रखा और सफलता मिली।
डॉ. योगेश कुमार की पत्नी डॉ. अवलोकिता अशोक का भी आईएएस में सेलेक्शन हुआ है। उनकी 915वीं रैंक आई है। अवलोकिता ने दिल्ली से एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की है। अवलोकिता के पिता डॉ. बीपी अशोक बसपा सरकार में लखनऊ में एएसपी पूर्वी रहे हैं।
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लाखों का पैकेज था, पर पापा का सपना पूरा करने को छोड़ दी नौकरी
इला त्रिपाठी, रैंक 51
इला की शुरुआती पढ़ाई लखनऊ में सीएमएस अलीगंज ब्रांच से हुई। उसके बाद नोएडा से बीटेक करने के बाद ढाई साल तक लखनऊ में प्राइवेट जॉब की। इसी दौरान तैयारी की और नौकरी छोड़कर 2016 मेंदूसरे अटेम्प्ट में बाजी मारी। इला कहती हैं, पिता स्व. पीएन त्रिपाठी आईएफएस अफसर रहे। उनकी दिली इच्छा थी कि मैं सिविल सर्विसेज जॉइन करूं।
मैंने इसके लिए दिन-रात मेहनत शुरू की, पर पिता साथ छोड़ दुनिया से चले गए। मैंने हार नहीं मानी। लाखों का पैकेज था मेरी प्राइवेट जॉब का। आए दिन बाहर का टूर भी लगा रहता था, ऐसे में मुझे लगा कि शायद पापा का सपना पूरा न हो।
करीब ढाई साल तक नौकरी करने के बाद सिविल सर्विसेज की तैयारी शुरू की। परिवार में मां, भाई और बड़ी बहन के साथ रह रहीं इला पापा केसपने की खुशी का सेलिब्रेशन करने नगर केहनुमान सेतु मंदिर पहुंचीं। मंदिर बंद होने से पहले पूरे परिवार ने दर्शन किये, प्रसाद चढ़ाया।
टिप्स : करेंट अफेयर्स और सेल्फ नोट बढ़िया रहते हैं।
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देश और समाज के लिए कुछ करने की चाहत ने बनाया आईएएस
- बिलाल मोहिउद्दीन भट (10वीं रैंक)
बिलाल मोहिउद्दीन भट का ताल्लुक भले ही कश्मीर से हो पर लखनऊ से भी गहरा नाता है। आईएफएस असफर बिलाल यहां वन विभाग में डिप्टी कन्जर्वेटर के पद पर तैनात हैं। वर्ष 2013 में आईएफएस में 23वीं रैंक मिली। डीसीएफ के पद पर तैनाती के बावजूद रुके नहीं, अपनी मंजिल यानी आईएएस की धुन में मग्न रहे।
बिलाल कहते हैं, हमेशा से देश के लिए कुछ करने की चाहत थी। बराबर प्रयास करते रहा। हिम्मत नहीं हारी। इसका नतीजा ये कामयाबी है। मूलत: उत्तरी कश्मीर के रहने वाले बिलाल कहते हैं, मैं अपने देश और समाज के लिए कुछ करना चाहता था। सिविल सेवा इसका सबसे अच्छा माध्यम है।
इसलिए मैंने अपना लक्ष्य सिविल सेवा ही रखा था। परीक्षा में सफलता मिली। इसलिए मैं इसका श्रेय अपने परिवार के साथ ही अपने साथियों को भी देना चाहता हूं।
टिप्स- सिविल का कोर्स बहुत ज्यादा है इसलिए हिम्मत न हारें, आत्मविश्वास बनाए रखें और कड़ी मेहनत करते रहें।
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लखनऊ के पूर्व एसएसपी की बेटी ने भी हासिल की कामयाबी
कृति पांडेय- (426वीं रैंक)
एमटेक के बाद कृति पांडेय के पास अच्छी नौकरी थी। शानदार पैकेज के साथ सीमित घंटें नौकरी का मौका था। पर दिल में सुकून नहीं था। कृति कहती हैं, कुछ करने का जज्बा था इसलिए सिविल सेवा की तैयारी शुरू की। दूसरे प्रयास में सफलता मिल ही गई।
कृति के पिता राजेश कुमार पांडेय लखनऊ के पूर्व एसएसपी रह चुके हैं। कृति की मां मीनू पांडेय गृहिणी हैं। उनके अनुसार सिविल सेवा में जाने की प्रेरणा कृति को अपने पापा से मिली। कृति ने बताया कि सिविल सेवा में सफल होने के लिए जरूरी है कि कड़ी मेहनत की जाए। नोट्स की भूमिका बेहद अहम है। सफलता के लिए अपने पर भरोसा रखें।
टिप्स- नोट्स बनाएं, खुद पर भरोसा बनाएं रखें। हिम्मत न हारें।
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कड़ी मेहनत और समर्पण से मिलती है सफलता
सी. दिनेश कुमार (24वीं रैंक)
सिविल सेवा में सफलता के लिए जरूरी है कि कड़ी मेहनत की जाए। इसका कोई विकल्प नहीं है। इसके साथ लक्ष्य के प्रति समर्पण भी बेहद जरूरी है। यह कहना है संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा में 24वीं रैंक हासिल करने वाले सी.दिनेश कुमार का।
इंडियन रेलवे इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रांसपोर्ट मैनेजमेंट लखनऊ में कार्यरत दिनेश का सिविल सेवा में यह छठा प्रयास था। उनके पिता चंद्रशेखर असिस्टेंट पुलिस कमिश्नर हैं। कोयंबटूर से मैकेनिकल इंजीनियरिंग करने वाले दिनेश कुमार ने वर्ष 2015 में 525वीं रैंक हासिल की थी।
इस साल इसमें सुधार करके वे 24वीं रैंक पर आ गए हैं। दिनेश कुमार ने बताया कि परीक्षा के लिए रोजाना चार से पांच घंटे तैयारी करते थे। विषय के हिसाब से टाइम टेबल तैयार कर लेते थे और लिखकर अभ्यास करते रहते थे।
टिप्स- डेडीकेशन, हार्ड वर्क और फोकस वर्क से ही सफलता मिलती है।
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उतार-चढ़ाव में हिम्मत न हारे : सत्यम
आईएएस दंपती एनएस रवि और शारदा सिंह के परिवार के लिए बुधवार का दिन खुशियां लेकर आया। उनके बेटे कुमार सत्यम की अखिल भारतीय सिविल सेवा परीक्षा में 337वीं रैंक आई है। सत्यम को पिछली बार इंडियन रेवेन्यू सर्विस कॉडर मिला था। नागपुर में ट्रेनिंग ले रहे सत्यम कहते हैं कि सफलता के लिए कठिन मेहनत, दृढ़ निश्चय और निरंतरता जरूरी है।उतार-चढ़ाव आते रहते हैं, लेकिन हर प्रतियोगी को हिम्मत बनाए रखनी चाहिए।
विशाल खंड, गोमतीनगर निवासी कुमार सत्यम ने वर्ष 2012 में ट्रिपल आईटी इलाहाबाद से इलेक्ट्रॉनिक्स एवं कम्युनिकेशन में बीटेक की डिग्री ली थी। नौकरी करने के बजाय उन्होंने सिविल सर्विसेज की तैयारी शुरू की। इस बार उनका चौथा प्रयास था। तीसरी कोशिश में वह भारतीय राजस्व सेवा के लिए चुने गए थे। इन दिनों वह नागपुर में आईआरएस की ट्रेनिंग ले रहे हैं।
टेलीफोन पर बातचीत में सत्यम ने बताया कि उन्होंने लोक प्रशासन विषय लेकर तैयारी शुरू की। साल-डेढ़ साल दिल्ली में कोचिंग ली। वह कहते हैं कि सफलता का एक ही सूत्र है, लगे रहिए, लगे रहिए। कई बार आपको झटका लगता है, उतार-चढ़ाव आते हैं लेकिन ऐसी परिस्थितियों में हिम्मत और हौसला कमजोर नहीं पडऩा चाहिए। वह मानते हैं कि कड़ी मेहनत और दृढ़ निश्चय का कोई विकल्प नहीं है। इनके साथ ही निरंतरता जरूरी है।
सत्यम के पिता एनएस रवि वरिष्ठ आईएएस अधिकारी है। वर्तमान में वह ग्राम्य विकास विभाग में अपर मुख्य सचिव हैं। उनकी माता शारदा सिंह भी आईएएस अधिकारी हैं। इस समय वह आयुष विभाग में विशेष सचिव है। एनएस रवि 1884 बैच के आईएएस अधिकारी है और उनका गृह जनपद बिजनौर है। उनके दो बेटों में सत्यम छोटा है। सत्यम की 10वीं और 12वीं की पढ़ाई डीपीएस नोएडा में हुई है। वह शुरू से ही मेधावी रहे हैं। सत्यम के सिविल सेवा के लिए चुने जाने के बाद से आईएएस दंपति के परिवार में बधाइयों का तांता लगा हुआ है।
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आईएएस अफसर भाई से मिली प्रेरणा
प्रमोद यादव, रैंक 630
सचिवालय में प्राइवेट सेक्रेटरी और गोमतीनगर, विनय खंड निवासी सुशील कुमार के छोटे बेटे प्रमोद यादव ने सिविल सर्विसेज परीक्षा में सफलता पाई है। प्रमोद के बड़े भाई पवन यादव पूर्व में आईएएस अफसर बने और इस समय मणिपुर में तैनात हैं।
प्रमोद कहते हैं कि मुझे भाई से ही सिविल सर्विसेज में जाने की प्रेरणा मिली। मेरी सफलता का पूरा श्रेय उन्हीं को जाता है। उन्होंने बताया कि परीक्षा के दौरान बहुत तनाव होता है लेकिन मैंने 8-9 घंटे नियमित पढ़ाई की।
अपने गोल पर ध्यान रखा और सकारात्मक होकर तैयारी की। परिणाम के बारे में नहीं सोचा। पढ़ाई के दौरान वॉट्सअप, फेसबुक से दूरी बनाई रखी। ब्लॉग लिखना हॉबी है।
टिप्स- परिणाम की चिंता किए बगैर तैयारी करें। लक्ष्य को पाना है ये हमेशा याद रखकर तैयारी करें।
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पहले मेजर बन की देश सेवा अब सिविल सर्विसेज
मेजर विराट मिश्रा, रैंक 477
मेजर विराट मिश्रा के बाबा दिनेश चंद्र मिश्रा ब्रिगेडियर थे। विराट को भी आर्मी जॉइन करने की लगन थी। 2007 में सीडीएस के माध्यम से लेफ्टिनेंट बने। सात साल में वह मेजर तक बने और फिर स्वैच्छिक सेवानिवृत्त ले ली और सिविल सर्विस की तैयारी शुरू कर दी।
पहली बार में उन्हें सफलता नहीं मिली इसी बीच उनकी नौकरी मिनिस्ट्री ऑफ ह्यïूमन रिसोर्स में असिस्टेंट सेक्रेटरी के पद पर लगी। दूसरे अटेम्प्ट में आखिर सफलता मिल ही गई। विराट कहते हैंं कि सिविल सेवा में आने का एकमात्र लक्ष्य आम लोगों की सेवा करना।
कोई गड़बड़ी न कर सके और आम लोगों को उनका हक दिला सकूं। पिता अशोक कुमार मिश्रा सेवानिवृत्त बैंक मैनेजर हैं और लखनऊ में ही तैनात रहे। मां रेखा मिश्रा गृहिणी हैं। पत्नी दिव्या मिश्रा मनीपाल यूनिवर्सिटी में शिक्षिका हैं।
टिप्स- जो भी करें समझकर और मेहनत से करें। आम लोगों के लिए कुछ करने के इरादे से करें।
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आईएएस पिता से मिले टिप्स और खुद के नोट्ïस ने दिलाई कामयाबी
पंकज कुमार मिश्रा, रैंक-414
लखनऊ के रहने वाले पंकज ने शुरुआती पढ़ाई महाराजगंज से पूरी की। पर, इंटरमीडिएट राजधानी में सीएमएस से किया। उसके बाद चेन्नई से बीटेक किया। चौथे प्रयास में उन्हें यह कामयाबी मिली। पंकज कहते हैं, बचपन से ही सिविल सर्विसेज में जाने का मन था।
आईएएस पिता राकेश कुमार मिश्रा (मौजूदा समय में जिलाधिकारी बलरामपुर) से टिप्स मिलते रहे। शुरुआती तीन प्रयासों के बाद भी लगातार तैयारियां और पढ़ाई जारी रहीं। खुद के बनाए नोट्ïस और लगातार रिवीजन को तैयारी का आधार बनाया। साथियों की भी मदद ली।
टिप्स : हमेशा खुद के बनाए नोट्ïस से ही पढ़ाई करें, क्योंकि इससे आपको सटी जानकारी बार-बार सामने आती रहती है, दूसरा आपका रिवीजन लगातार होता रहता है।
महिला-बुजुर्गों के लिए कुछ करके दिखाना है
शिल्पी कनौजिया, रैंक 535
मारुतिपुरम निवासी शिल्पी कन्नौजिया शुरू से ही महिलाओं और बुजुर्गों के लिए कुछ करना चाहती थीं। इसके लिए उन्होंने सिविल सर्विस को चुना। सीएमएस से इंटर करने के बाद केजीएमसी से एमबीबीएस और गाइनी में एमएस। इस बीच वह समय निकालकर तैयारी करती रहीं। परिवार का पूरा सहयोग मिला।
2014 में पहली बार सफलता मिली और इंडियन रेलवे ट्रैफिक सर्विस की ट्रेनिंग शुरू की। 2015 में शादी हुई, पति डॉ. कमलेश वर्मा टाटा कैंसर इंस्टीट्यूट, मुंबई में सर्जन हैं। वे कहती हैं पति ने भी पढ़ाई में सहयोग किया और 2016 में फिर से सलेक्शन हुआ, बेहतर रैंक मिली। शिल्पी कहती हैं, आज नेट पर काफी सामग्री उपलब्ध है। न्यूज पेपर से खुद को अपडेट किया और कंसंट्रेट होकर पढ़ाई की। शिल्पी के पिता सुरेंद्र पाल कन्नौजिया सेवानिवृत्त बैंक अधिकारी हैं और मां ऊषा कन्नौजिया हाउसवाइफ हैं।
टिप्स- करेंट अफेयर्स से अपडेट रहें। स्नातक के सब्जेक्ट पर फोकस करें। पर्सनेलिटी डवलपमेंट पर भी ध्यान दें। पहले मेजर बन की देश सेवा अब सिविल सर्विसेज