प्रतीकात्मक तस्वीर
एक तरफ जहां सोशल मीडिया खुलापन लेकर आया है, लोग पहले से कहीं ज्यादा मुखर हुए हैं, वहीं दूसरी ओर अपेक्षाओं पर खरे न उतर पाने का डर युवाओं को गिरफ्त में ले रहा है। इसका युवाओं पर कैसा असर पड़ रहा है, ये जानने के लिए केजीएमयू के मनोचिकित्सक डॉ. आदर्श त्रिपाठी से हमने बात की। डॉ. त्रिपाठी बताते हैं,मैं एक दिन की ओपीडी में कम से कम सात ऐसे मरीजों को तो देखता ही हूं। इनका औसत मान लिया जाए तो एक सप्ताह में 30-40 मरीज केजीएमयू के ही मानसिक रोग विभाग में आ जाते हैं। वहीं, मनोचिकित्सक व बीबीएयू में चीफ साइकोलॉजिकल काउंसलर डॉ. नेहा आनंद बताती हैं कि मैं हफ्ते में चार से पांच ऐसे मरीज देखती हूं। इस सबका कितना बुरा असर मरीज की जिंदगी पर पड़ता है, इस सवाल पर वे बताती हैं कि सही इलाज न होने पर उम्र के साथ बढ़ता जाता है और कई अन्य शारीरिक व मानसिक बीमारियों का शिकार बनाता है।