कोई बच्चा एक ही खिलौना बार-बार मांगता है। आप जिस चीज के लिए उसे आवाज दे रहे हैं, उसकी अनसुनी कर रहा है और उसे जिस चीज की जरूरत है, वह सुन ले रहा है। वह खुद में खोया रहता है तो संभव है कि वह ऑटिज्म से पीड़ित हैं। ऐसे बच्चों को चिकित्सक को दिखाना चाहिए। यह कहना है इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक एसोसिएशन लखनऊ के उपाध्यक्ष बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. आशुतोष वर्मा का।
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डॉ आशुतोष वर्मा
- फोटो : amar ujala
विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस से एक दिन पहले सोमवार को मीडिया से बातचीत में उन्होंने बताया कि बच्चा बुलाने पर ध्यान नहीं दे तो पहले कान की जांच करानी चाहिए। कान में कि सी तरह की दिक्कत नहीं है तो संभव है कि वह ऑटिज्म का शिकार हो। ऐसे बच्चों की बाल रोग विशेषज्ञ को दिखाना चाहिए। बिहेवियर थेरेपी के जरिये ऐसेे बच्चों को ठीक किया जा सकता है। ऐसे बच्चों में दवा से कहीं ज्यादा जरूरी है उसकी काउंसलिंग।
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डॉ विवेक अग्रवाल
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20 फीसदी ऑटिस्टिक बच्चे खुद के लिए हो सकते हैं जानलेवा
केजीएमयू के मानसिक रोग विभाग की ओर से लखनऊ के 40 ऑटिस्टिक बच्चों पर की गई शोध में पाया गया कि 20 प्रतिशत ऑटिस्टिक बच्चे खुद के लिए खतरनाक साबित हो सकते हैं। विभाग के डॉ. विवेक अग्रवाल ने बताया कि यह शोध केजीएमयू के चाइल्ड साइकियाट्री विभाग में आ रहे 4 से 16 उम्र के बीच के 40 एएसडी (ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिस्ऑर्डर) बच्चों पर की गई है। इसमें ने 20 प्रतिशत बच्चों का व्यवहार बेहद आक्रामक पाया गया।
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डेमो
पहचानें लक्षण
- ऑटिज्म पीड़ित बच्चे सामाजिक नहीं होते।
- संवाद में पीछे रहते हैं, निगाह मिलाकर बात नहीं करते।
- न तो खुद कुछ समझ पाते हैं और न ही दूसरों को समझा पाते हैं।
- हावभाव अजीब सा रहता है, शांत और खुद में खोए रहते हैं। ऑटिज्म बच्चों में भी होती है विलक्षण प्रतिभा
ऑटिज्म पीड़ित एक तिहाई बच्चों को मंदबुद्धि की भी समस्या होती है, लेकिन कुछ में विलक्षण प्रतिभा जैसे पजल्स हल करना, संगीत, चित्रकला में अव्वल होने के साथ याददाश्त तेज हो सकती है। ऑटिज्म पीड़ित बच्चों को रोजमर्रा के कार्य धीरे-धीरे सिखाने की सलाह दी जाती है।
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जानिए, क्या है ऑटिज्म
ऑटिज्म एक न्यूरो संबंधी डिस्ऑर्डर है। इस बीमारी से पीड़ित बच्चा आंख से आंख मिलाकर बात नहीं करता है। घर में मौजूद दूसरे बच्चों में घुलने-मिलने के बजाय अपने आप में खोया रहता है। ऐसे बच्चों में बोलने और सामाजिक व्यवहार में परेशानी होती है। यह वंशानुगत रोग है और जन्म के बाद भी होता है। जन्म के पूर्व गर्भावस्था में, जन्म के समय व बाद में दिमागी चोट व बुखार होने से यह दोष हो सकता है। वैज्ञानिक भाषा में यह रोग बायोलॉजिकल व न्यूरोकेमिकल समस्या के कारण होता है। इसकी पहचान के लिए फिजिकल और न्यूरोलॉजिकल परीक्षण किया जाता है। ऐसे संभव है निदान
ऑटिज्म पीड़ित बच्चे के पेट की जांच, न्यूट्रिशन की स्थिति, रोग प्रतिरोधक क्षमता, न्यूरोट्रांसमीटर इम्बैलेंस, शरीर में मरकरी और लेड जैसे जहरीले तत्वों की जांच की जाती है। इसके अलावा बीमारी का कारण अनुवांशिक तो नहीं, इसका पता लगाने के लिए मॉलिक्युलर और सेल्युलर लेवल पर जांच की जाती है। इसके बाद बच्चों का उसकी जरूरत के अनुसार इलाज शुरू किया जाता है।
प्रो. विवेक अग्रवाल का कहना है कि प्रदूषण और खानपान के कारण ऑटिज्म की समस्या बढ़ रही है। खाने पीने की चीजों में केमिकल उत्पादों की मिलावट के कारण जेनेटिक बदलाव हो रहे हैं। इन जेनेटिक बदलावों से ऑटिज्म की समस्या बढ़ रही है। अनुवांशिक कारणों के अलावा यह कारण भी ऑटिज्म को बढ़ावा दे रहे हैं। उन्होंने बताया कि गर्भावस्था के दौरान प्रदूषण से बचाव के साथ खानपान पर भी ध्यान देना चाहिए। गर्भावस्था में अधिक तनाव, अधिक दवाओं का सेवन व कुपोषण के अलावा प्रसव के समय असावधानियां भी शिशु को ऑटिस्टिक बना सकती हैं। उन्होंने कहा कि इस समय विश्व में हर 10 हजार में से 65 व्यक्ति ऑटिस्टिक है। केजीएमयू में भी पहले जहां एक माह में एक से 2 मरीज आते थे, वहीं अब हर रोज ओपीडी में दो से तीन मरीज आ रहे हैं। क्वीन मेरी अस्पताल की प्रो. रेखा सचान ने हर हाल में घर पर प्रसव कराने से बचने की सलाह दी।