रंजीत
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लखनऊ आने की कहानी
मुझे लगा कि अगर गांव में रहा तो ऐसी मुफलिसी की जिंदगी मुझे भी बितानी पड़ेगी। मां-पापा से आशीर्वाद और नसीहत ली। मां ने कहा ‘ बेटा जो कुछ भी करना, मेहनत और ईमानदारी से करना, गांव और परिवार का नाम खराब न करना’। सीख की ये पूंजी लेकर जुलाई 1997 में लखनऊ आ गया। बहुत तलाश किया, लोगों की खुशामद की पर कोई मुझे काम पर रखने को राजी नहीं हुआ। आखिरकार भगवान को मुझ पर तरस आ गया और एक कोठी में हेल्पर की नौकरी मिली। इतने कम पैसे मिलते कि मेरा गुजारा बड़ी मुश्किल से होता। खैर थोड़े दिन बाद महानगर में एक जगह वेटर का काम मिल गया। यहां की पगार पहले से बेहतर थी और मुफ्त में खाना भी मिलता था। महीनों तक पैसे बचा-बचा कर रखता और उन्हें घर भेजता। इसी दौरान एक हादसे में मेरे एक साथी का काम करने के दौरान हाथ जल गया। मालिक ने सहानुभूति तो दूर उसे नौकरी से ये कह कर निकाल दिया कि जले हाथ से कैसे दूसरों को खाना परोसेगा।