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Awadh: अवध में छाए रहे बाहरी... अटल से लेकर इंदिरा तक यहां की जमीन ने इन नेताओं को बनाया कद्दावर

Wed, 20 Mar 2024 04:17 PM IST
ishwar ashish श्रीकांत मिश्र, अमर उजाला, लखनऊ
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पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, नानाजी देशमुख व राजनाथ सिंह। - फोटो : amar ujala
अवध आत्मीय है। यह अपनाता है। अपनत्व दिखाता है। केंद्रीय राजनीति के दरवाजे खोलता है तो सत्ता के शीर्ष तक भी पहुंचाता है। पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी से लेकर राजीव गांधी व स्व. अटल बिहारी वाजपेयी तक की फेहरिस्त लंबी है। इन्हें आम से खास अवध ने ही बनाया। कद को भी कद्दावर बनाया। प्रस्तुत है श्रीकांत मिश्र की रिपोर्ट...।

अटल बिहारी वाजपेयी
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 1955 में लखनऊ से उपचुनाव में किस्मत आजमाई और तीसरे नंबर पर रहे। 1957 में वे तीन सीटों से आम चुनाव में उतरे। मथुरा सीट पर उन्हें चौथा स्थान मिला, जबकि लखनऊ में उपविजेता बने। 

- बलरामपुर से जीत पहली बार लोकसभा पहुंचे। 1967 में उन्होंने बलरामपुर से फिर चुनाव जीते। इसके बाद लखनऊ के रण में वह अजेय बने रहे। बात अटल जी की करें तो वह मूल रूप से ग्वालियर मध्य प्रदेश के रहने वाले थे। 
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नानाजी देशमुख और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी - फोटो : अमर उजाला
नानाजी देशमुख: अविभाजित गोंडा का हिस्सा रही बलरामपुर सीट से 
नानाजी देशमुख ने 1977 में प्रतिनिधित्व किया। चंडिकादास अमृतराव देशमुख (पूरा नाम) की ख्याति नानाजी के रूप में रही। वह मूल रूप से महाराष्ट्र के रहने वाले थे।

- नानाजी ने शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण स्वावलंबन के क्षेत्र में काम किया। गोंडा-बलरामपुर सीमा पर जयप्रभा ग्राम उनकी कर्मस्थली रही। भारत सरकार ने 2019 में उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से नवाजा। पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने उन्हें केंद्रीय कैबिनेट मंत्री की पेशकश की, लेकिन नानाजी ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। आपातकाल के बाद 1977 में हुए चुनाव में नानाजी ने बलरामपुर लोकसभा क्षेत्र से भारी अंतर से जीत हासिल की। 
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रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह - फोटो : एक्स/राजनाथ सिंह
राजनाथ सिंह: विदेश में भी नामचीन विजय लक्ष्मी पंडित, प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की रक्तसंबंधी व फ्रीडम फाइटर श्योराजवती नेहरू और मंत्री फिर राज्यपाल रहीं शीला कौल को लखनऊ की जनता ने सांसद बनाया।

- साल 1991 की रामलहर में यहां से सांसद चुने जाने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने लगातार पांच चुनावों में जीत दर्ज की। हर दफा मार्जिन सुकून का संदेश देता रहा। यहीं से जीतने के बाद वाजपेयी को प्रधानमंत्री बनने का अवसर भी मिला। 2014 और 2019 में राजनाथ ने इसे अपना राजनीतिक ठिकाना बनाया। दोनों बार वह केंद्र में मंत्री बने। राजनाथ मूल रूप में चंदौली के रहने वाले हैं।

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सोनिया गांधी व इंदिरा गांधी। - फोटो : amar ujala
इंदिरा गांधी से सोनिया तक
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और पत्रकार रहे फिरोज गांधी 1952 और 57 के आम चुनाव में संसद भवन में रायबरेली की आवाज बने।

- वर्ष 1967 और 71 में रायबरेली ने इंदिरा गांधी को सांसद के रूप में चुना। मगर 1977 की सरकार विरोधी लहर में उन्हें जनता पार्टी के राजनारायण से शिकस्त खानी पड़ी। 1980 में वह फिर से रायबरेली का प्यार पाने में कामयाब रहीं। समय बीता अरुण नेहरू, शीला कौल के बाद सतीश शर्मा ने इस सीट का दर्द संसद में साझा किया। साल 2004 से लगातार सोनिया गांधी यहां से सांसद हैं।
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कांग्रेस नेता राहुल गांधी व पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी। - फोटो : amar ujala
राजीव गांधी व राहुल गांधी
कांग्रेस के किले के रूप में प्रख्यात अमेठी सीट पर पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी के छोटे बेटे संजय गांधी ने वर्ष 1980 के चुनाव में जीत दर्ज की। उनके निधन के बाद 81 में हुए उपचुनाव में पायलट राजीव गांधी की पॉलिटिक्स के साथ-साथ संसद में भी इंट्री होती है।

- यह सिलसिला 1984, 89 व 91 में जारी रहा। इसके बाद सोनिया गांधी और फिर राहुल गांधी ने अमेठी की शान बरकरार रखी। 2019 के आम चुनाव में स्मृति इरानी से राहुल को हार का सामना करना पड़ा। राहुल से लेकर स्मृति तक की गिनती परदेशियों में ही होती है।
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सुभद्रा जोशी। - फोटो : amar ujala
सुभद्रा जोशी: सियालकोट (अब पाकिस्तान) में मूल रूप से जन्मीं सुभद्रा जोशी भारत के स्वाधीनता आंदोलन की नायिका रहीं। वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से सांसद रहीं। उन्होंने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया।

- जोशी ने 'शांति दल' की स्थापना में मदद की, जो उन कठिन समय के दौरान एक शक्तिशाली सांप्रदायिक विरोधी ताकत बन गया। सुभद्रा जोशी को पार्टी का संयोजक बनाया गया। साल 1962 में बलरामपुर लोकसभा सीट से वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के चुनाव चिह्न पर मैदान में उतरीं और संसद पहुंच गईं। लेकिन अगले चुनाव में साल 1967 में इसी सीट से उन्हें हार का सामना करना पड़ा। भारतीय जनसंघ उम्मीदवार के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें शिकस्त दी।
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- फोटो : amar ujala
मायावती: अंबेडकरनगर सीट पहले अकबरपुर (सुरक्षित) के नाम से जानी जाती थी। वर्ष 1977 में मंगलदेव विशारद यहां से चुनकर निचले सदन में पहुंचे। बरेली के मूल निवासी घनश्याम चंद्र खरवार को बसपा संस्थापक स्व. कांशीराम ने यहां से हाथी पर चढ़ाकर मैदान में उतारा था। घनश्याम चुनाव जीतकर सांसद बने।

- बसपा का गढ़ बन चुके अंबेडकरनगर को सूबे की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने अपना चुनावी क्षेत्र बनाया। वह तीन बार यहां से सांसद रहीं। 1998 फिर 1999 और 2004 में उन्होंने लोकसभा में इस सीट का प्रतिनिधित्व किया। वर्ष 2002 और 2004 में उनके इस्तीफे के बाद यहां उपचुनाव भी हुए। मायावती मूल रूप से गौतम बुद्ध नगर जिले की रहने वाली हैं।
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