काकोरी कांड में फरार चंद्रशेखर आजाद लखनऊ के जिस जर्जर मकान में घुसे उसमें एक वृद्ध महिला मिलीं। आजाद से बातचीत के दौरान वृद्धा को खांसी आ गई तो ऊपर कमरे में पढ़ रही वृद्धा की बेटी नीचे उतरने लगी। आजाद एक कोने में छिप गए।
युवती ने महिला की पीठ सहलाई तो खांसी रुकी। आजाद को न देखकर वृद्धा बोली, ‘वह कहां गया अभी तो यहीं था। मुझसे बातें कर रहा था।’ युवती को लगा कि मां की तबियत ज्यादा खराब हो गई और वह रोने लगी। तभी आजाद कोने से निकलते हुए बोले, ‘मैं तो यहीं हूं।’
युवती ने पूछा, ‘यह कौन हैं?’ वृद्धा ने परिचय कराते हुए आजाद के लिए खाना मंगाया। बरतानिया हुकूमत में खुफिया विभाग में काम करने वाले धर्मेंद्र गौड़ ने संस्मरण में लिखा है, ‘वृद्धा ने आजाद से कहा, ‘यह मेरी बेटी कल्पना है। संस्कृत से एमए कर रही है। साथ ही 20 रुपये पर ट्यूशन पढ़ाती है, जिससे घर का खर्च चलता है।