हिंदू धर्म में विवाह संस्कार का बहुत महत्व हैं। सात फेरों के बाद ही युवक युवती अपना वैवाहिक जीवन शुरू करते हैं, लेकिन मोहनलालगंज के सिसेंडी कस्बे में सात फेरों के बाद नवदंपति के बाबा बृद्धेश्वर का आशीर्वाद लेने की भी परंपरा है। कहते हैं नवविवाहित जोड़ा जब तक बाबा के दर्शन न कर ले विवाह अधूरा माना जाता है। ऐसा ही रिवाज दशकों से चला आ रहा है।
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प्राचीन शिवालयों में शुमार स्वयंभू शिवलिंग महाभारत काल का हैं। कहते हैं जहां बाबा विराजमान है, वहां कभी जंगल हुआ करता था। जंगल में स्थित एक छोटे से टीले पर एक गाय आती तो स्वत: उसका दूध टपकने लगता।
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बृद्धेश्वर शिव मंदिर
- फोटो : amarujala
लोगों ने जब यह माजरा देखा तो उत्सुकतावश टीले की खोदाई शुरू कर दी। खोदाई में शिवलिंग नजर आए। लोगों ने जब शिवलिंग को जंगल से गांव में स्थापित करने की सोची तो उसकी और खोदाई की, लेकिन जितनी खोदाई होती शिवलिंग उतना ही नीचे चला जाता।
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इसी बीच फावड़ा शिवलिंग से छू गया तो दूध की धार निकल पड़ी, जिसके बाद लोगों ने खोदाई बंद कर दी। रात में खोदाई करने वाले लोगों को स्वप्न आया कि इसी जगह मंदिर का निर्माण हो, जिसके बाद लोगों ने मंदिर का निर्माण कर पूजा-अर्चना शुरू की।
समय-समय पर ग्रामीणों ने जीर्णोद्धार कराकर मंदिर को भव्यता प्रदान की। भक्त महिमाराम त्रिवेदी बताते हैं कि बाबा की पूजा अर्चना के साथ ही गांव में यह परंपरा चल रही है। गांव में जब भी कोई मांगलिक आयोजन होता है तो उसकी शुरुआत बाबा बृद्धेश्वर से ही होती है।