लखनऊ में दीवाली के अगले दिन शुरू होने वाले जमघट में पतंगबाजी अपने चरम पर होती है। लोग सारे काम छोड़ देते हैं...पतंग की छुड़ैया देने के लिए। (फोटो-अर्जुन साहू)
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लखनवी जमघट: जब लड़ते हैं खुशनुमा 'पेंच'
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दूर तलक आसमान में सिर्फ अपनी पतंग देखने का शगल और शौक मजेदार होता है। चरखियां खाली हो जाएं, तो होती रहें।
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शिद्दत इतनी होती है कि महिलाएं भी अपने बच्चों के लिए खाना-पीना तैयार करके पतंग के कन्ने सही करने में जुट जाती हैं।
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इस मौके पर सिर्फ बच्चे ही नहीं, पूरा परिवार छत पर पतंग और मंझा संभालता हुआ नजर आता है।
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बड़े खुशनुमा पेंच लड़ाते हैं तो बच्चे मंझे में ही उलझे मजे लेते रहते हैं।
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छुड़इया लो बेटा, जाओ अब उस काली पतंग को काटकर ही पतंग उतारना...
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यार, इन लोगों की पतंगें खत्म ही नहीं हो रहीं। एक को छुड़इया दी तो दूसरी थमा दी गई। लगता है हम पतंगबाजी के उस्ताद बन जाएंगे...यही बात कर रही हैं न मैडम?
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बहुत सही कर लिए पतंगों के ठड्डे...अब हम मम्मियां भी पतंग उड़ाएंगी, पेंचें लड़ाएंगी...