लोकसभा चुनाव से पहले सबके लिए एक कानून का मुद्दा गरम है। तमाम बुद्धिजीवी इसके विरोध में नहीं हैं, पर वे चाहते हैं कि पहले सरकार इसका मसौदा जारी करे ताकि इसकी सार्थकता या निरर्थकता पर स्वस्थ संवाद हो सके।
आमतौर पर समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के दायरे में हैं- शादी व तलाक, उत्तराधिकार व विरासत, गोद व संरक्षण और भरण-पोषण का अधिकार। विभिन्न धर्मों को मानने वालों के लिए इससे संबंधित कानून अलग-अलग हैं। आदिवासी समूहों के निजी कानूनों में भी वैविध्यता है।
मसलन, मुस्लिम परिवार में दादा के जीवित रहते अगर किसी पुरुष (पोते) के पिता का निधन हो जाता है तो पर्सनल लॉ के अनुसार, संपत्ति पोते को नहीं, बल्कि दादा या दादा के शेष पुत्रों को हस्तानांतरित होगी। बड़ी संख्या में मुस्लिम बुद्धिजीवी ऐसे हैं, जो इस शरिया कानून को उचित नहीं मानते हैं। इसमें सुधार की मांग कर रहे हैं।
हिंदु धर्म में पहले पिता की संपत्ति में बेटी का हक नहीं होता था, लेकिन बाद में संबंधित कानून में संशोधन करके बेटों और बेटियों को समान अधिकार दिए गए। इसी तरह से आदिवासी समुदायों में भी विवाह के अपने-अपने प्रचलित नियम हैं। माना जा रहा है कि यूसीसी इन्हीं सब भेदभावों या व्यक्तिगत कानूनों का समाधान होगा।