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सद्भाव की अयोध्याः हिंदू मुस्लिम एकता की मिसाल देखनी हो तो आएं इधर, यहां एक साथ मांगते हैं दुआ

Sat, 09 Nov 2019 09:49 AM IST
Amulya Rastogi धीरेंद्र सिंह, अमर उजाला, अयोध्या
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अयोध्या में मणिपर्वत स्थित शीश पैगंबर की दरगाह पर दुआ करते लोग - फोटो : amar ujala
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अयोध्या विवाद की सियासी तल्खी से इतर हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल देखनी हो तो पुरातत्व से संरक्षित पौराणिक मणिपर्वत आ जाइए। यहां ऊपर सीता-राम की धुन के साथ घंटे-घड़ियाल की आवाज के बीच आरती की धुन गूं्जती मिलेगी। ठीक पास में इस्लाम के दूसरे पैगंबर माने गए हजरत शीश की मजार पर जियारत करते एक साथ दिखेेंगे हिंदू-मुसलमान। ताज्जुब तब होगा, जब हजरत शीश के बारे में जानकारी देने के लिए मुतवल्ली से लेकर खादिम तक एक नाम लेंगे, 18वीं सदी में पैदा हुए सिद्ध संत परमहंस बाबा राम मंगल दास का, जिनके बारे में सभी संत-महंत एकमत होकर कहते हैं कि उन्हें साक्षात हनुमानजी का दर्शन प्राप्त था। बाबा को लोग पैगंबर, पीर-फकीरों के भी बहुत निकट मानते थे। रामनगरी अयोध्या का इस्लाम से जुड़ाव सातवीं शताब्दी में आखिरी पैगंबर हजरत मोहम्मद से बहुत पहले का है।
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शीश पैंगबर की दरगाह - फोटो : amar ujala
वेद में अयोध्या को ईश्वर का नगर बताया गया है। अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या... और इसकी संपन्नता की तुलना स्वर्ग से की गई है। रामायण के अनुसार अयोध्या की स्थापना मनु ने की थी। यह पुरी सरयू के तट पर बारह योजन (लगभग 144 कि.मी) लम्बाई और तीन योजन (लगभग 36 कि.मी.) चौड़ाई में बसी थी। सनातन धर्म अयोध्या में मनु महाराज से सृष्टि की उत्पत्ति मानता है, जबकि इस्लामिक परंपरा के प्रथम पैगंबर के रूप में हजरत आदम की प्रतिष्ठा है।इन्हीं हजरत आदम की औलादों में हजरत शीष दिव्य गुणों से युक्त थे, उन्हें दूसरे पैगंबर का गौरव हासिल है। पत्नी बीबी हूर और चार बच्चों के साथ उनकी मजार पौराणिक महत्व के स्थल मणिपर्वत के पृष्ठ में है। यहां मुस्लिमों के साथ हिंदू भी जियारत करने आते हैं और शीश पैगंबर सांप्रदायिक विभेद से ऊपर रामनगरी के वरिष्ठतम बुजुर्ग के रूप में प्रतिष्ठित हैं। रविवार को भी यही नजारा दिखा, हिंदू भाई फूल-अगरबत्ती व चादर लिए मन्नतें मांगते दिखे। काबिले गौर है कि यहां उर्स के दौरान जो भंडारा लगता है और जो प्रसाद वितरित किया जाता है वह पूर्णतया शाकाहारी होता है।
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मोहम्मद सुहैल - फोटो : amar ujala
हजरत शीश पैगंबर अलैहिस्लाम की दरगाह के खादिम मोहम्मद सुहैल बताते हैं कि हजरत शीश पैगंबर अलैहिस्लाम को नबी कहा जाता है। दुनियाभर का भ्रमण करने के बाद अल्लाह के हुक्म पर वे मणिपर्वत के पृष्ठ भाग में रहते थे। हिंदुओं में तबसे लेकर आजतक इस स्थान की गहरी आस्था है। यहां मन्नते मांगने रोज तमाम हिंदू परिवार आते हैं, पूरी होने पर जियारत करते हैं। मजार की इमारत को सुल्तान सिकंदर लोदी ने तामीर कराई थी। सिंकदर लोदी के गुरु जलाद्दीन नक्सबंदी जो मुल्तान से आए थे, उनकी मजार भी शीश पैगंबर की मजार के बाहर बनी है। वे कहते है कि यहां नबी के बारे में कोई किताब नहीं है, जो कुछ एक कमरे था, उसे बाहरी तत्वों ने 1992 में जला दिया था। लेकिन अयोध्या गोकुल भवन के सिद्ध संत बाबा राममंगल दास जी ने शीश पैगंबर समेत करीब 300 हजरत, पीर व फकीरों पर लिखा है।

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मिर्जा सहाब - फोटो : amar ujala
साकेत पीजी कालेज के वाणिज्य के विभागाध्यक्ष व नवाब हसन रजा खां मस्जिद चौक के मुतवल्ली डॉ. मिर्जा साब साह कहते हैं कि पुरखों से यही सुनते आ रहे हैं कि मणिपर्वत के पास ये दरगाह कौमी एकता की मिसाल है।
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परशुराम दास - फोटो : amar ujala
भक्तिभाव और सद्भाव की मिसाल थे राममंगल बाबा: महंत परशुराम दास
श्रीरामजन्मभूमि के ठीक पीछे स्थित गोकुल भवन के महंत परशुराम दास कहते हैं कि उनके गुरू महाराज दिव्य संत परमहंस राममंगल दास जी (1893-1984) बाल कृष्ण के अनन्य भक्त थे। हनुमान जी उन्हें साक्षात दर्शन देते थे। वे शीश पैगंबर, बड़ी बुआ, नौगजा पीर, शाह इब्राहिम समेत करीब 300 पैगंबर, पीर-फकीर, सूफी-संतों के बारे में किताब लिख चुके हैं। रात-रातभर मजारों पर रहते थे, भक्तिभाव से बातें करते थे। यहां रात में तमाम बार ऐसे वाकये उन्होंने सुनाए जब वे पीर-फकीरों से बाते करते रहते थे, नाम लेकर कहते थे कि फलां-फलां आए हैं। हम सबसे मजारों की सफाई करवाते थे। वे कहते हैं भक्तिभाव से परमहंस महाराज में शीश पैगंबर को साधा था, अपनी किताब भक्त भगवंत चरितावली एवं चरितामृत में लिखते हैं कि शीश पैगंबर अरब से आए थे।
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