उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में शनिवार को बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी ने गठबंधन का एलान किया। बसपा सुप्रीमो मायावती और सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा कि ये गठबंधन सिर्फ 2019 के लोकसभा चुनावों के लिए नहीं है, बल्कि ये लंबा चलेगा और स्थाई है। दोनों दलों ने कहा कि वे लोकसभा में यूपी की 38-38 सीटों पर चुनाव लड़ेंगी। रायबरेली और अमेठी सीट कांग्रेस के लिए छोड़ी गई है और बाकी दो सीटें सहयोगी पार्टियों के लिए।
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अखिलेश यादव और मायावती
- फोटो : अमर उजाला
प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए मायावती गेस्ट हाउस कांड का जिक्र करना नहीं भूलीं और उन्होंने कहा कि देशहित और जनहित में उन्होंने इस गठबंधन को उस कांड पर तरजीह दी है। मायावती ने कहा, 1993 विधानसभा चुनावों में भी दोनों दलों के बीच गठबंधन हुआ था और तब सपा-बसपा ने हवाओं का रुख बदलते हुए सरकार बनाई थी। हालांकि ये गठबंधन कुछ गंभीर कारणों से लंबे समय तक नहीं चल सका था। देशहित और जनहित को 1995 के लखनऊ गेस्ट कांड के ऊपर रखते हुए राजनीतिक तालमेल का फैसला किया है।
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इस कड़वाहट की क्या वजह थी?
लेकिन लखनऊ के गेस्ट हाउस में ऐसा क्या हुआ था जिससे दोनों पार्टियों की दोस्ती अचानक दुश्मनी में बदल गई। इसे समझने के लिए करीब 25 बरस पहले झांकना होगा। उत्तर प्रदेश की राजनीति में साल 1995 और गेस्ट हाउस कांड, दोनों बेहद अहम हैं। उस दिन ऐसा कुछ हुआ था जिसने न केवल भारतीय राजनीति का बदरंग चेहरा दिखाया बल्कि मायावती और मुलायम के बीच वो खाई बनाई जिसे लंबा अरसा भी नहीं भर सका। दरअसल, साल 1992 में मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी बनाई और इसके अगले साल भाजपा का रास्ता रोकने के लिए रणनीतिक साझेदारी के तहत बहुजन समाज पार्टी से हाथ मिलाया।
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मुलायम और कांशीराम
- फोटो : amar ujala
सपा और बसपा ने 256 और 164 सीटों पर मिलकर चुनाव लड़ा। सपा अपने खाते में से 109 सीटें जीतने में कामयाब रही जबकि 67 सीटों पर हाथी का दांव चला। लेकिन दोनों की ये रिश्तेदारी ज्यादा दिन नहीं चली। साल 1995 की गर्मियां दोनों दलों के रिश्ते खत्म करने का वक्त लाईं। इसमें मुख्य किरदार गेस्ट हाउस है। इस दिन जो घटा उसकी वजह से बसपा ने सरकार से हाथ खींच लिए और वो अल्पमत में आ गई।
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भाजपा, मायावती के लिए सहारा बनकर आई और कुछ ही दिनों में तत्कालीन राज्यपाल मोतीलाल वोहरा को वो चिट्ठी सौंप दी गई कि अगर बसपा सरकार बनाने का दावा पेश करती है तो भाजपा का साथ है। वरिष्ठ पत्रकार और उस रोज इस गेस्ट हाउस के बाहर मौजूद रहे शरत प्रधान ने बीबीसी को बताया कि वो दौर था जब मुलायम यादव की सरकार थी और बसपा ने समर्थन किया था, लेकिन वो सरकार में शामिल नहीं हुई थी। साल भर ये गठबंधन चला और बाद में मायावती की भाजपा के साथ तालमेल की खबरें आईं जिसका खुलासा आगे चलकर हुआ। कुछ ही वक्त बाद मायावती ने अपना फैसला सपा को सुना दिया।
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गेस्टहाउस कांड
- फोटो : बीबीसी
उन्होंने कहा कि इस फैसले के बाद मायावती ने गेस्ट हाउस में अपने विधायकों की बैठक बुलाई थी। सपा के लोगों को किसी तरह इस बात की जानकारी मिल गई कि बसपा और भाजपा की सांठ-गांठ हो गई है, वो सपा का दामन छोड़ने वाली है। प्रधान ने कहा कि 'जानकारी मिलने के बाद बड़ी संख्या में सपा के लोग गेस्ट हाउस के बाहर जुट गए, कुछ ही देर में गेस्ट हाउस के भीतर के कमरे में जहां बैठक चल रही थी, वहां मौजूद बसपा के लोगों को मारना-पीटना शुरू कर दिया। ये सब हमने अपनी आंखों से देखा है।
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तभी मायावती जल्दी से जाकर एक कमरे में छिप गईं और अंदर से बंद कर लिया। उनके साथ दो लोग और भी थे। इनमें एक सिकंदर रिजवी थे, वो जमाना पेजर का हुआ करता था। रिज़वी ने मुझे बाद में बताया कि पेजर पर ये सूचना दी गई थी कि किसी भी हालत में दरवाजा मत खोलना। दरवाज़ा पीटा जा रहा था और बसपा के कई लोगों की काफी पिटाई की गई। इनमें से कुछ लहूलुहान हुए और कुछ भागने में कामयाब रहे।
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मायावती और कांशीराम
- फोटो : बीबीसी
प्रधान के मुताबिक, तब बसपा के नेता सूबे के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को फोन कर बुलाने की कोशिश कर रहे थे लेकिन तब किसी ने फोन नहीं उठाया। इस बीच मायावती जिस कमरे में छिपी थीं, सपा के लोग उसे खोलने की कोशिश कर रहे थे और बचने के लिए भीतर मौजूद लोगों ने दरवाजे के साथ सोफे और मेज लगा दिए थे ताकि चटकनी टूटने के बावजूद दरवाजा खुल न सके। वरिष्ठ पत्रकार राम दत्त त्रिपाठी उत्तर प्रदेश में खेले गए इस सियासी ड्रामे के तार दिल्ली से जोड़ते हैं। उनका कहना है कि साल 1992 में जब बाबरी मस्जिद तोड़ी गई, तो काफी झटका लगा था। उसके बाद 1993 में सपा-बसपा ने भाजपा को रोकने के लिए हाथ मिलाने का फैसला किया और अपनी पहली साझा सरकार बनाई। मुलायम मुख्यमंत्री बने।
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उस वक्त दिल्ली में नरसिम्हा सरकार थी और भाजपा के दिग्गज नेता अटल बिहारी वाजपेयी थे। दिल्ली में इस बात की फिक्र होने लगी थी कि अगर लखनऊ में ये साझेदारी टिक गई तो आगे काफी दिक्कतें हो सकती हैं। इसलिए भाजपा की तरफ से बसपा को पेशकश की गई कि वो सपा से रिश्ता तोड़ लें तो भाजपा के समर्थन से उन्हें मुख्यमंत्री बनने का मौका मिल सकता है। मुलायम को इस बात का अनुमान हो गया था और वो चाहते थे कि उन्हें सदन में बहुमत साबित करने का मौका दिया जाए, लेकिन राज्यपाल ने ऐसा नहीं किया।
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कौन बचाने पहुंचा था माया को?
इसी खींचतान के बीच अपनी पार्टी के विधायकों को एकजुट रखने के लिए बसपा ने सभी को स्टेट गेस्ट हाउस में जुटाया था और मायावती भी वहीं पर थीं। तभी सपा के लोग नारेबाजी करते हुए वहीं पहुंच गए थे। बसपा का आरोप है कि सपा के लोगों ने तब मायावती को धक्का दिया और मुकदमा ये लिखाया गया कि वो लोग उन्हें जान से मारना चाहते थे। इसी कांड को गेस्ट हाउस कांड कहा जाता है। ऐसा भी कहा जाता है कि भाजपा के लोग मायावती को बचाने वहां पहुंचे थे लेकिन शरत प्रधान का कहना है कि इन दावों में दम नहीं है कि भाजपा के लोग मायावती और उनके साथियों को बचाने के लिए वहां पहुंचे थे।
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प्रेस कांफ्रेंस में बसपा सुप्रीमो मायावती का स्वागत करते सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव।
- फोटो : amar ujala
उन्होंने कहा कि मायवती के बचने की वजह मीडिया थी। उस वक्त गेस्ट हाउस के बाहर बड़ी संख्या में मीडियाकर्मी मौजूद थे। सपा के लोग वहां से मीडिया को हटाने की कोशिश कर रहे थे लेकिन ऐसा हो न सका। कुछ ऐसे लोग भी सपा की तरफ से भेजे गए थे जो समझाकर मायावती से दरवाजा खुलवा सके, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। इसके अगले रोज भाजपा के लोग राज्यपाल के पास पहुंच गए थे कि वो बसपा का साथ देंगे, सरकार बनाने के लिए और तब कांशीराम ने मायावती को मुख्यमंत्री पद पर बैठाया और यहीं से मायावती ने सीढ़ियां चढ़ना शुरू कीं।
क्या मायावती ने कभी खुलकर इस दिन के बारे में बताया कि असल में उस दिन क्या हुआ था, प्रधान ने कहा, ''जी हां, कई बार मुझे दिए इंटरव्यू में या फिर प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने खद कहा कि उनका ये स्पष्ट मानना है कि उन्हें उस दिन मरवाने की साजिश थी, जिससे बसपा को खत्म कर दिया जाए। मायावती को सपा से इतनी नफरत इसलिए हो गई क्योंकि उनका मानना है कि गेस्ट हाउस में उस रोज जो कुछ हुआ, वो उनकी जान लेने की साजिश थी।