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राहुल के बदलने के बाद क्या बदली अमेठी, तस्वीरें

Mon, 25 May 2015 12:53 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, लखनऊ
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(अखिलेश बाजपेयी)मिर्जागढ़ में नीम के पेड़ के नीचे तख्त पर बैठे राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 10 में जीरो नंबर देते हैं, तो नीचे दरी पर बैठी 30-40 महिलाएं तालियां बजाती हैं। वहीं, कुछ दूर कुर्ता-पायजामा पहने राम जतन पास खड़े व्यक्ति से कहते हैं कि इस बार राहुल भैया बहुत बदले हुए हैं। पर, इसी बीच एक आवाज राहुल के मोबाइल लाउडस्पीकर पर चल रहे भाषण को चीरती हुई गूंजती है, ‘चलो यहां से, हमार कोई न सुनी।’
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पास ही खड़ा 20-22 साल का एक युवक टिप्पणी करता है... छुट्टी के बाद राहुल-टू भले बदल गए, पर अमेठी के हालात बदलें तभी तो इसका कोई मतलब है।’ दूसरा कहता है, खुद तो मोदी को जीरो नंबर देते हैं। ... अमेठी का विकास तो माइनस वन नंबर लायक भी नहीं है।
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घुटनों के ऊपर धोती चढ़ाएं एक बुजुर्ग भाषण देते राहुल गांधी से कुछ कहना चाह रहे थे। पर, वहां तक वह पहुंच नहीं पा रहे हैं। राहुल एक नजर उनकी तरफ देखते भी हैं पर फिर भाषण में जुट जाते हैं।

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राम अभिलाष बड़बड़ाते हुए कहते हैं, ‘पच्चीस साल बाद तो इधर आए फिरौ सुनै का मौका नाहीं। कुछ करबो किहिन हैं। बस आए और नवा सपना देखाए कै फिर चले जइहै। न सड़क, न गरीबन के पास घर, न राशन कार्ड और सिर छुपावे का छत। मजूरी के अलावा कउनव सहारा नाही। पता नाहीं कहां की बात बताए रहे हैं। काट लेंय जब तक काटे का है, पुरिखन की बोई फसल।’
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बहुआ गांव के अय्यूब राहुल से कह रहे हैं कि क्षेत्र में न कोई रोड है और न हमारे बच्चों की बेरोजगारी दूर करने को कोई योजना। राहुल जवाब देते हैं, हमारी सरकार न यहां (लखनऊ में) है और न वहां (दिल्ली में)। तभी भीड़ से कोई कहता है, क्षेत्र तो आपका है। आपको देखना चाहिए। राहुल चुप हो जाते हैं। सियासी सच्चाई आंखों के सामने गूंजने लगती है। आखिर इस देश में मंच के भाषण व मैदान की सच्चाई का अंतर कब खत्म होगा।
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हर तरफ सच्चाई पर सिर्फ राजनीति
राहुल के काफिले के पीछे आगे बढ़ता हूं तो गड्ढों और धूल भरी सड़कें अमेठी संसदीय सीट की सच्चाई सामने रखने लगती है। मौसम की मार ने किसानों का गेहूं ही नहीं, भूसा भी बरबाद कर दिया है। किसानों का दर्द है कि ज्यादातर लेखपालों ने नेताओं व दबंगों के घर बैठकर सर्वे कर डाला है। राहत उन्हें बांटी जा रही है जिन्हें जरूरत ही नहीं है।
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राहुल ने हसवां में 50 किसानों की पंचायत में भले ही एसडीएम से सवाल करके लोगों को यह समझाने की कोशिश की हो कि उनकी दुर्दशा के लिए केंद्र की मोदी सरकार व प्रदेश की अखिलेश सरकार जिम्मेदार है। पर, लोगों के लिए तो इस सवाल का उत्तर तलाशना ही बहुत बड़ी बात है कि राहुल के जाने के बाद उन्हें लेखपाल व तहसील से मिलने वाली मदद दिलाएगा कौन?

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जिन्होंने जोश में लेखपाल की शिकायतें की हैं, उनके खेतों को गलत नाप होने से बचाएगा कौन? हसवां गांव के मोड़ के पास कुछ लोगों (नाम बताते हैं, लेकिन अखबार वाला जानते ही नाम न छापने की गुहार करते हैं। कहते हैं कि इहां तो पंचायत के नाम पर विधायक जी (एमएलसी दिनेश सिंह) नौटंकी कराइन हैं। नाम दई देहो तो इलाके में रहै का भी न मिली।) की इस बात से इलाके का सच समझ में आ जाता है कि जब दिल्ली से फुरसत मिली तो चलै हैं हमार हाल लेय चले आए। चले जइहैं और फिर ढाक के तीन पात।

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मुद्दा न बन जाए 11 साल बनाम एक साल
कुछ यह सवाल भी उठाते हैं कि मोदी से एक साल में ही सवाल पूछने वाले राहुल तो यहां से 11 साल से सांसद है। आखिर वे अमेठी को सवालों से मुक्त क्यों नहीं बना पाए। इनके सवाल यूं ही नहीं है। राहुल और उनके लोगों को यह भले लग रहा हो कि वे मेगा फूड पार्क का मुद्दा उठाकर अमेठी के विकास पर उठने वाले सवालों पर परदा डालने में सफल साबित हो रहे हैं।

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अपने वायदों की तरफ से लोगों का ध्यान बंटाने में कामयाब हो रहे हैं। पर, जमीन पर ऐसा नहीं दिखता। फूड पार्क की बात पर उन्हें भले ही तालियों की आवाज सुनाई देती है, पर यह तालियां उनके स्थानीय नेताओं की तरफ से जुटाए जाने वाले लोगों और उनके परिवार को भगवान की तरह मानने वाले दुखी लाल जैसे कुछ बुजुगों की ही होती है। पर लोगों की बात सुनकर यही लगता है कि अमेठी में सियासी लड़ाई का मुद्दा एक साल बनाम 11 साल में न बदल जाए।

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राहुल के दावे पर लोग कह रहे देखो, सपने कब तक देखना है राहुल जब फूड पार्क का मुद्दा उठाते हैं, नौजवानों को रोजगार न मिलने का साल उठाते हैं तो भीड़ में कठौरा पेट्रोलियन रिफाइनरी और पेट्रोलियम इंस्टीट्यूट न बनने का भी सवाल लोगों को मथने लगता है। 1996 से 2004 तक हर चुनाव में कभी कैप्टन सतीश शर्मा तो कभी सोनिया गांधी और फिर राहुल गांधी इस रिफाइनरी या पेट्रोलियम इंस्टीट्यूट को बनवाने का वादा करके चुनाव लड़ते रहे।

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पर, 2004 से 2014 तक दस साल सत्ता में रहने के बावजूद यह वादा मूर्त रूप नहीं ले पाया। लगभग 12 किमी. की परिधि में फैली इलाके के लोगों में रोजगार की आशा का केंद्र बनी मालविका स्टील को बदहाली से उबारने के लिए यूपीए सरकार ने सेल को दे दिया, पर यह फैक्ट्री अब भी बदहाली के दौर से नहीं उबार पाई। राहुल आज जब मंच से हिंदुस्तान पेपर मिल लगवाने का वादा दोहराते हैं तो लोग आपस में यही सवाल उछालते हैं कि देखो हम सबको विकास के सपने कब तक देखना है।

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बंद हो रही फैक्ट्रियां मांग रही हैं जवाब
क्षेत्र में यह सवाल भी अब तेज होता जा रहा है कि यूपीए सरकार में एक के बाद एक इलाके में बंद होती जा रही फैक्ट्रियों को खुलवा और चलवा न पाने वाले राहुल की किस बात पर भरोसा करें। लोग गिनाते हैं कि एग्रो पेपर मिल बंद गई। संजय गांधी द्वारा इंडस्ट्रियल एरिया में नींव पूजन वाले स्थान पर बनाई गई हाईटेक प्रिन्टिंग प्रेस ने दम तोड़ दिया। रूंगटा स्टील ठप हो गई। अमेठी टेक्सटाइल भी लोगों को रोजगार देने का सपना पूरा नहीं कर पाई। एपेक्स शू फैक्ट्री भी नहीं चल पाई। लोग बेरोजगार होते चले गए।

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सड़कों और पुलों की कौन लेगा जिम्मेदारी
सड़क  और पुलों की बात करें तो अमेठी में सिर्फ एक ही जवाब मिलता है, जगदीशपुर ढकवा सड़क को छोड़कर ठीक कौन सी है। भले ही राहुल और उनके साथ चलने वाले लोग भाषणों में कामों की लंबी फेहरिश्त गिनाते हों लेकिन लाल खां का पुरवा, नहर कोठी ही नहीं गौरीगंज और जायस के आसपास के कई गांव के रास्ते अभी दुरुस्त होने का इंतजार ही कर रहे हैं। सड़कें गड्ढों में तब्दील हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार यह सालों से ऐसी ही है। भादर विकास खंड में मालती नदी पर पुल बनाने की मांग तीन दशक बाद भी पूरी नहीं हो पाई है। (अमेठी से रायबरेली जाने वाली सड़क।)

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अमटाही के पूर्व प्रधान राजकुमार सिंह कहते हैं कि हर चुनाव से पहले यहां नाप-जोख शुरू होती है। चुनाव निपटता है और पुल का वादा भी अगले चुनाव के लिए फाइलों में बंद हो जाता है। इसी ब्लॉक के नेवरिया गांव के लोगों को एक स्थानीय नदी पर पुल न होने के कारण दो किलोमीटर दूर स्थित गांव कल्याणपुर जाने के लिए 12 किलोमीटर का चक्कर लगाना पड़ता है। यहां के लोगों से भी राहुल कई बार पुल बनवाने का वादा कर चुके हैं। इलाके में कई गरीब परिवारों के पास राशन कार्ड नहीं है।

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इंदिरा आवास और लोहिया आवास जैसी योजनाओं का लाभ हकीकत में गरीब लोगों तक नहीं पहुंच पाया है। कई स्कूलों की बिल्डिंग जर्जर हैं। कहीं नई बनी भी हैं तो पुरानी ज्यों की त्यों खड़ी है। जो कल हादसे का कारण भी बन सकती हैं। वास्तव में राहुल भले ही अपने को कुछ बदल रहे हों लेकिन अमेठी को बदहाली से उबारने का काम शुरू होना अभी बाकी है।

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सियासत की हकीकत यही है
समहा गांव के एक बाग में राहुल के खाने के लिए बड़े-बड़े कंटेनर व टिफिन बाक्स रखे गए हैं। उससे कुछ दूरी पर एक टूटे छप्पर के नीचे एक सात-आठ साल के बच्चे समेत चार लोग तीन सूखी रोटी, करीब सौ ग्राम भात और नमक से भूख मिटाने की कोशिश कर रहे हैं। (अगली स्लाइड में।)
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लगता है सियासत का सच यही है। गरीबों की चिंता सिर्फ मंच से करने के लिए है। शायद यही वजह है कि गरीबों व किसानों के लिए संघर्ष करने की बात करने वाले राहुल महिलाओं की गुहार को अनसुनी कर आगे बढ़ जाते हैं।
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