लखनऊ विश्वविद्यालय के शताब्दी समारोह का आगाज आज गुरूवार को हो गया। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कार्यक्रम का शुभारंभ किया।विश्वविद्यालय के 100 वर्ष पूरे होने पर पूर्व छात्र-छात्राओं ने अपनी यादें अमर उजाला के साथ साझा कीं।
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पंकज प्रसून, हास्य कवि
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यहीं से शुरू हुई साहित्यिक यात्रा
मैं वर्ष 2006 में जब लविवि का छात्र था तो कानपुर के कल्चरल फेस्ट अंतराग्नि में हिस्सा लेने गयाथा। उस वक्त निशि पांडेय ने टीम बनाई थी और मैं वहां से सर्वाधिक पांच पुरस्कार जीतकर लाया था। उस समय के कुलपति डॉ. एसपी सिंह ने मुझे विश्वविद्यालय की शान बताया था और विशेष पुरस्कार से नवाजा था। यहीं से साहित्यिक यात्रा शुरू हुई। आज उसी विवि ने स्वर्णिम वर्ष समारोह में प्रस्तुति के लिए याद किया है। रोमांचित हूं। - पंकज प्रसून, हास्य कवि
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राकेश चंद्रा, सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारी
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विचारधारा को कोई बंधन नहीं
विश्वविद्यालय में एलएलबी के लिए दाखिला लिया, साथ ही पीजी भी किया। चार साल का रिश्ता पुराने कैंपस से रहा, फिर प्रशासनिक सेवा से जुड़ गया। सेवानिवृत्त होने के बाद 2016 में नए कैंपस से पीएचडी कर रहा हूं। विचारधारा का कोई बंधन नहीं रहा। उदार दृष्टिकोण इस विवि की सबसे बड़ी खासियत है। विद्वानों की खान है ये परिसर। - राकेश चंद्रा, सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारी
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अभिषेक अग्रवाल, पूर्व छात्र व कैटेगरी मैनेजर
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लविवि ने आसान की आईआईएम की राह
लविवि मेरे जीवन का अहम हिस्सा है। इसने न केवल आईआईएम की राह आसान की बल्कि जीवन भर कि लिए प्रो. राजीव शुक्ला, प्रोक़े के शुक्ला जैसे गुरु भी दिए। विवि ने मुझे जीवन जीना भी सिखाया और करिअर की नींव भी दी। ऐसे अनमोल दोस्त भी दिए जिनसे अब भी पुरानी बातें करके दिल खुश हो जाता है। न्यू कैंपस की आइएमएस बिल्डिंग में क्लास के बाद दोस्तों कि साथ कैंटीन में समोसे छोले खाना, परीक्षा के बाद पेपर डिस्कस करना सब बहुत याद आता है। - अभिषेक अग्रवाल, पूर्व छात्र व कैटेगरी मैनेजर
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डॉ अनीता सहगल, राष्ट्रीय स्तर की उद्घोषिका व शिक्षाविद्
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कॅरिअर को नई दिशा मिली
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की छात्रा रही हूं। एक तमन्ना थी लखनऊ विश्वविद्यालय से डिग्री लेने की जो वर्ष 2016 में पूरी हुई। मेरी समझ से जो पढ़ना चाहते हैं, उनके लिए यह कैंपस सर्वश्रेष्ठ है। यह पढ़ने लिखने का माहौल देता है और आपके करिअर को नई दिशा देता है। परिपक्व सोच के साथ विद्यार्थी बाहर निकलते हैं। - डॉ. अनिता सहगल, राष्ट्रीय स्तर की उद्घोषिका व शिक्षाविद्
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डॉ एलपी मिश्रा
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शिक्षक के आते ही खत्म हो जाती थी भाषणबाजी
लविवि में मैंने 1965 में दाखिला लिया था। उस समय छात्रसंघ चुनाव के लिए प्रत्याशी जमकर भाषणबाजी करते थे। एक क्लास समाप्त होते ही कमरे में आ जाते हैं और अपनी बात कहने लगते, लेकिन जैसे ही प्रोफेसर आते वे अपना भाषण अधूरा ही छोड़कर आनन-फानन बाहर चले जाते। यह माहौल सिर्फ क्लासरूम में ही नहीं कैंपस के अंदर भी देखने को मिलता। -डॉ. एलपी मिश्रा, सीनियर एडवोकेट
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विभू वाजपेयी, नृत्यांगना
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योग्यता व कला को मिलता है सम्मान
2013 में विवि में प्रवेश लिया। एक सोच थी कि पता नहीं विवि का माहौल कैसा होगा, लेकिन कैंपस में जाने के बाद सारे संशय दूर हो गए। शिक्षक और खासकर विभागाध्यक्ष की सोच, उनका टीम वर्क निश्चित तौर पर सीख देता है। सबसे बड़ी बात कि योग्यता व कला का सम्मान करना जानते हैं परिसर के लोग। मैं जब गई तो कोई नहीं जानता था कि मुझे राष्ट्रपति पुरस्कार मिला है, मैं नृत्यांगना हूं, जब जान गए तो बहुत सम्मान दिया। - विभू वाजपेयी, नृत्यांगना, राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित
खचाखच भरी क्लास लेकर आया शिक्षक बनने का उत्साह
मैंने 1984 में लविवि में बीए में प्रवेश लिया। तब जाने-माने शिक्षक प्रो. शैलेंद्र सिंह द्वारा अपने पहले व्याख्यान में दी गयी दीक्षा ‘मेक स्टडी योर नेक्स्ट नेचर’ ने ज्ञानार्जन हेतु मेरी जिज्ञासा एवं तत्परता को नई ऊर्जा दी। बाद में मेरे जीवन की यही असली प्रकृति बन गई। विवि से मैंने 1988 में अर्थशास्त्र में एम. ए. करने के बाद प्रो. शैलेंद्र सिंह के मार्गदर्शन में पीएचडी का कार्य शुरू किया, लेकिन प्रो. सिंह के असामयिक निधन के कारण प्रो. ए.के. सेन गुप्ता के सुपरविजन में पीएचडी की डिग्री प्राप्त की। मुझे आज भी याद है जब एक दिन तत्कालीन विभागाध्यक्ष प्रो. परितोष बनर्जी ने कहा कि जाओ बीए माइक्रो इकोनॉमिक्स का क्लास लो। विद्यार्थियों से खचाखच भरे रूम में मैंने पहली क्लास ली। इसके बाद मेरे अंदर शिक्षक बनने का उत्साह आया। बाद में 1996 में आयोग से चयनित होकर लविवि से संबद्ध महाविद्यालय में शिक्षक बनी। - डॉ. भारती पांडेय, अध्यक्ष, अर्थशास्त्र विभाग, जेएनपीजी कॉलेज।
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प्रो.धर्मेंद्र सिंह सेंगर, पूर्व निदेशक भारतीय विधि संस्थान
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कुलपति का पेन उठाने के बाद मिली सीख
वर्ष 1972 में मैंने लविवि में बीएससी में दाखिला लिया और 1981 में एलएलएम करने के बाद गढ़वाल विवि में नियुक्त हो गया था। अपने छात्र जीवन की एक घटना मुझे आज भी याद है। उस समय आईएएस अधिकारी अशोक मुस्तफा कुलपति हुआ करते थे। एक दिन छात्र नेता अपनी मांग को लेकर उनके कार्यालय में घुस गए। इसमें मैं भी था। भीड़ जब लौटने लगी तो मैंने कुलपति का पेन उठा लिया और कहा कि मांग पूरी होने के बाद ही लौटाऊंगा। इसके बाद जब मैं उनको पेन लौटाने गया तो उन्होंने मुझे समझाया। इसका इतना असर हुआ कि उसके बाद से मैं किसी भी छात्र नेता के जुलूस में शामिल नहीं हुआ। उनकी वजह से ही मैं जीवन में सफल हो सका। - प्रो. धर्मेंद्र सिंह सेंगर, पूर्व निदेशक भारतीय विधि संस्थान
एलएलएम फाइनल ईयर में पास हुए सिर्फ दो
लविवि का विज्ञान संकाय हमेशा से ही बहुत उन्नत और प्रतिष्ठा रहा है। मैं भाग्यशाली हूं कि मुझे इसका विद्यार्थी, शिक्षक और डीन बनने का मौका मिला। लविवि में पढ़ाई का माहौल बेहद सख्त था। विशेषकर एलएलएम में। ऐसे समय में जब एलएलएम में मेरा दाखिला हुआ तो मेरे सीनियर ने कहा कि दाखिले से कुछ नहीं होता है, बड़ी बात पास होना है। पहले साल में बात काफी हद तक देखने को भी मिली। उस समय में सिर्फ आठ विद्यार्थी पास हुए। सौभाग्य से पास होने वाले विद्यार्थियों में मेरा नाम भी था। अंतिम सेमेस्टर की बारी आई तो पास होने वाले विद्यार्थियों का आंकड़ा घटकर सिर्फ दो ही रह गया। इस बार भी मैं पास हो गया। पीएचडी करने के बाद मैं यहीं पर अध्यापक हो गया। - प्रो. सीपी सिंह, डीन लॉ, लविवि