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'अम्मा' के लिए 'बेटा' बने फैजाबाद डीएम, अंतिम विदाई तक ऐसे निभाया साथ

Fri, 07 Sep 2018 03:20 PM IST
टीम डिजिटल, अमर उजाला, लखनऊ
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- फोटो : amar ujala
जिसका कोई नहीं, उसका खुदा है यारों... जी हां इस गाने को चरितार्थ किया है फैजाबाद के जिलाधिकारी डॉ. अनिल कुमार पाठक ने, जो एक लावारिस वृद्धा के लिए मसीहा साबित हुए। करीब 15 दिन पहले सड़क दुर्घटना में घायल वृद्धा का न सिर्फ उन्होंने इलाज कराया बल्कि उसकी मृत्यु होने पर एक बेटे की तरह विधि-विधान से उनका अंतिम संस्कार भी किया। मंगलवार को फैजाबाद में ये दृश्य देखकर हर किसी की आंखें नम हो गईं और ऐसे कर्तव्यपरायण और मानवीय दृष्टिकोण को सर्वोपरि मानकर चलने वाले आईएएस अधिकारी की सबने तहे दिल से तारीफ की। आगे की स्लाइड्स में पढ़ें पूरा मामला। (फोटो - वृद्ध महिला के शव का अंतिम संस्कार करते फैजाबाद के जिलाधिकारी डॉ. अनिल कुमार पाठक।)
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dr. anil kumar pathak - फोटो : amar ujala
फैजाबाद-लखनऊ राष्ट्रीय राजमार्ग पर करीब 15 दिन पहले गोड़वा के पास एक लावारिस वृद्ध महिला जख्मी हालत में सड़क के किनारे पड़ी थी। उधर से गुजरते हुए जिलाधिकारी अनिल कुमार पाठक की नजर जब वृद्धा पर पड़ी तो उन्होंने तुरंत गाड़ी रुकवाई। महिला को अपने वाहन से जिला अस्पताल पहुंचाया और अपने सामने ही इलाज शुरू कराया। 
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faizabad DM anil kumar pathak - फोटो : amar ujala
इतना ही नहीं, जब डॉक्टरों ने बताया कि महिला का जबड़ा दुर्घटना में टूट गया है और उसका इलाज फैजाबाद में संभव नहीं है तो डीएम ने लखनऊ मेडिकल विश्वविद्यालय के डॉक्टरों की टीम से संपर्क साधा। उन्होंने एक विशेषज्ञ डॉक्टर को फैजाबाद बुलाकर वृद्ध महिला का ऑपरेशन कराया। फिर तो मानो उस वृद्ध महिला से एक रिश्ता सा बन गया। वृद्धा को अम्मा कहकर संबोधित करने वाले डीएम साहब रोजाना उस बूढ़ी महिला का हाल-चाल लेते और ये काम उनकी दिनचर्या में शामिल हो गया था। 

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faizabad DM - फोटो : amar ujala
इलाज के दौरान करीब 15 दिन बाद अम्मा का निधन हो गया। इसके बाद सरकारी प्रक्रिया के तहत 24 घंटे तक मृत महिला के परिजनों का इंतजार किया गया। जब कोई नहीं पहुंचा तो मंगलवार दोपहर जिलाधिकारी अनिल कुमार पाठक ने जमथरा घाट स्थित श्मशान स्थल पर स्वयं अम्मा को मुखाग्नि दी। मुंहबोली मां को अंतिम विदाई देते समय डीएम की आंखें बेहद नम दिखीं। 
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faizabad dm - फोटो : amar ujala
जिलाधिकारी फैजाबाद कि इस माननीय पहले ने उन तमाम अधिकारियों के लिए एक नजीर कायम कर दी है जो अपने वृद्ध मां-पिता को बोझ समझते हैं। यही नहीं, इससे पहले भी वे दिव्यांगों और गरीबों के लिए मददगार साबित हुए हैं। उनका ये व्यवहार उन अफसरों के लिए भी सीख है जो बुजुर्गों और गरीबों पर ओहदे का रौब जमाते हैं। 
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