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दलितों के मुखर होने से 2019 के लिए भाजपा की चुनौती बढ़ी, आंदोलन में सपा-बसपा दोस्ती का असर

Tue, 03 Apr 2018 09:19 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
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एससी-एसटी एक्ट के बहाने ही सही, हिंदी पट्टी के राज्यों में दलितों का मुखर होना एक सियासी संदेश भी है। केंद्र सरकार ने एससी-एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ सोमवार को रिव्यू पिटीशन दाखिल कर दिया, फिर भी गुस्सा उसी के खिलाफ फूटा। 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा के सामने दलितों को साधने की चुनौती बढ़ गई है।
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दलित संगठनों ने एससी-एसटी एक्ट को कमजोर करने के विरोध में भारत बंद का आह्वान किया था। इस मुद्दे पर यूपी के साथ ही एमपी, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, बिहार, झारखंड समेत लगभग सभी हिंदी भाषी राज्यों में दलित काफी मुखर दिखाई दिए। सभी राज्यों में दलित उभार उनकी नाराजगी दिखा रहा है।
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यही वजह है कि दलितों ने केंद्र सरकार पर अपना गुस्सा उतारा, जबकि एससी-एसटी एक्ट के तहत दर्ज मामलों में जांच के बाद गिरफ्तारी का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने दिया था। यह स्थिति भाजपा के लिए बहुत अच्छी नहीं मानी जा रही है। भाजपा सांसद सावित्री बाई फुले और सहयोगी भासपा के मंत्री ओमप्रकाश राजभर का रुख भी उसकी चिंता बढ़ाने वाला है।
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सपा-बसपा दोस्ती का दिखा असर
उत्तर प्रदेश में दलितों के आंदोलन में सपा-बसपा दोस्ती का असर भी दिखा। कई जिलों में सपा नेता दलितों के आंदोलन में सक्रिय रहे। यूं भी गठबंधन के बाद गोरखपुर व फूलपुर सीट जीतने से दोनों दलों के समर्थकों, खासतौर से दलित, पिछड़े उत्साहित है। सोमवार को दलितों का यह उत्साह कई जगह सड़कों पर दिखा।
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