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दो दिनों से पेट में नही गया दाना... कलेजे का टुकड़ा भी बेहाल, रो-रोकर सूख चलीं बेबस आंखें

Wed, 20 May 2020 06:10 PM IST
ishwar ashish चंद्रभान यादव/अमर उजाला, लखनऊ
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घरों को वापस लौटते मजदूर। - फोटो : amar ujala
सुबह के करीब छह बजे हैं। लखनऊ के पूर्वी छोर पर अलग नजारा है। सूरज की बढ़ती तपिश की तरह जिंदगी की जद्दोजहद भी यहां कुछ ज्यादा ही तेज है। कमता तिराहे पर सड़क किनारे दूध के पाउच बिक रहे हैं। यह देख पार्वती की आंखें छलक जाती हैं। वो दूध जो उसके देवरानी के कलेजे के टुकड़े की भूख मिटा सकता है, उसे देखकर यूं रोना...? उसकी ख्वाहिश तो है वो पाउच मांग ले, पर जमीर की बेड़ियां जुबान पर ताला लगा देती हैं। कितनी बेबस है वो। दो दिन से उन सबको खाना भी तो नहीं मिला। पेट में दाना हो तब तो दूध उतरे? बेबसी खीझ बनकर पति पर निकलती है। वो कोसती है- न कनॉट पिलेस (कनॉट प्लेस) का किस्सा सुनउता, न ई दिन देखे पड़त।

पार्वती कमता तिराहे पर पैदल चले जा रहे मजदूरों की झुंड में बेबसी का एक चेहरा भर है। उसे किसी से शिकवा नहीं। किसी से शिकायत नहीं। सिर्फ पति विश्वनाथ के सिवा। वो बेसाख्ता बड़बड़ाए जा रही है-अम्मा (सासू) रोकत रहीं। नहीं माने...। तब मनता भी कइसे, दिल जउन दिल्ली में लगा रहा। पार्वती बताती हैं पति ने सपने दिखाए तो दिल्ली चले गए। साथ में देवर-देवरानी को भी ले गए। जिंदगी बदलने लगी। पति शटरिंग का काम करने वाले मजदूर से ठेकेदार बन गए। तो हम दोनों घरों में झाड़ू-पोंछा करने लगे।

करीब आठ माह पहले देवरानी को बेटा पैदा हुआ। जश्न मना...। मैं काम पर जाने के बजाय देवरानी को संभालने लगी। समय बीता। अभी काम पर जाने के लिए दोनों तैयार हुई थी कि कोरोना आ गया। काम-धंधा बंद हो गया। जो कुछ जोड़े थे  इस उम्मीद में खर्च करते रहे कि अगले महीने सब ठीक हो जाएगा। लेकिन हालात बदले ही नहीं। जब आमदनी खत्म तो किराया कैसे चुकाते? हालात सुधरने की गुंजाइश नहीं दिखी। कुछ गहने गढ़वाए थे, उसे बेचकर घर को निकल पड़े। कुछ दूर पैदल तो कुछ दूर ट्रकों के सहारे कानपुर पहुंचे। अब वहां से पैदल ही...! वह रो पड़ती है। खाली हाथ गए थे, खाली हाथ लौट रहे।
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सुना मजदूरों को रोका जा रहा तो खेतों के रास्ते चल दिए

सूरज की किरणें जैसे-जैसे सीधे सिर पर आने को हो रही हैं बस्ती के अशोक कुमार कुशवाहा और उनके साथियों के कदमों की चाल तेज होती जा रही है। मजबूरी की डगर पर चलते-चलते पैर जवाब दे गए हैं। अशोक बताते हैं कि पांच साल से सूरत में रह रहे थे। 15 हजार  रुपये की पगार मिल जाती। रहने का ठिकाना मुफ्त मिल जाने से जिंदगी की गाड़ी कम पगार में भी आसानी से चल रही थी। सभी खुशहाल थे। पर...? कोरोना आया तो कंपनी ने बाहर कर दिया। 




 
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कोई वाहन कुचल न दे इसलिए खेतों में सोते हैं...

फैजाबाद के रमेश भी इसी भीड़ में हमें मिलते हैं। वो बताते हैं बेहतर जिंदगी की चाहत थी। इसी चाहत ने तीन साल पहले जोधपुर जाने वाली ट्रेन में बैठा दिया। वहां बासनी में कपड़ा धुलाई के काम में लग गया। वहां रहने की समस्या थी लेकिन गोरखपुर के संदीप का साथ मिला तो यह मुश्किल भी आसान हो गई। कंपनी बंद हो गई। दिन तो चलते हुए गुजर जाता है लेकिन नींद आने पर डर लगता है। सड़क किनारे सोने पर गाड़ियों से कुचल जाने का डर लगता है। इसलिए सड़क से दूर खेतों में सोते हैं। कोई कुछ दे देता है तो खा लेते हैं।
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