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परिवार और समाज समझें अपनी जिम्मेदारी तो रुके महिलाओं पर हिंसा

Sat, 24 Nov 2018 09:25 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
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अमर उजाला संवाद
लड़कियों की सुरक्षा के लिए क्या होना चाहिए? उनके साथ हो रही हिंसा कैसे थमेगी? परिवार, समाज और खुद उनकी क्या भूमिका हो सकती है? बेटियों की सुरक्षा को लेकर ऐसे ही तमाम सवालों के जवाब शनिवार को ‘अमर उजाला’ की ओर से आयोजित अपराजिता संवाद कार्यक्रम के दौरान राजधानी की महिलाओं व युवतियों ने तलाशने का प्रयास किया। 

25 नवंबर को देश-दुनिया में महिला हिंसा के विरुद्ध दिवस का आयोजन होने जा रहा है। ‘अपराजिता- 100 मिलियन स्माइल्स’ के तहत अमर उजाला कार्यालय में आयोजित संवाद में हिंसा के अलग-अलग रूपों पर अलग-अलग विचार भी सामने आए, जिनका निचोड़ कुछ इस प्रकार रहा...
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अमर उजाला संवाद
बाल कल्याण समिति की सदस्य डॉ. संगीता शर्मा ने कहा कि यह बात लगातार कही जा रही है कि महिलाओं के प्रति होने वाले अपराध, खासकर हिंसा के मामले बढ़े हैं। मेरा मानना है कि इस प्रकार के मामलों की रिपोर्टिंग बढ़ी है और यह अच्छी बात है। इससे हमें भयभीत नहीं होना चाहिए। यह ग्राफ अभी भले ही ऊपर चला जाए, लेकिन यह नीचे भी आएगा।

ताहिरा हसन, सोशल एक्टिविस्ट ने कहा हमारा सामना ऐसी सोच से है, जो आरोपियों को बचाने के लिए लड़कियों के कपड़ों से लेकर उनके खाने-पीने तक को दुष्कर्म की वजह बताने से नहीं चूकते। लखनऊ में चार साल की बच्ची से दुष्कर्म हो जाता है, सोचिए इस प्रकार के मामलों में भी क्या पीड़िता का दोष तलाशा जाएगा?
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अमर उजाला संवाद
 तलाक-हिंसा को महिला की प्रतिष्ठा से न जोडे़ं :डॉ. सुप्रिया सिंह, शिक्षाविद्
आज भी हमारे समाज में यह सोच मौजूद है कि अगर किसी महिला का तलाक हो जाए तो इससे उसके परिवार की प्रतिष्ठा खराब होती है। अगर वह किसी हिंसा से पीड़ित है तब भी यही सोचा जाने लगता है जबकि पुुरुष के साथ ऐसा नहीं है। यह खत्म होना चाहिए।

अब हर रोज छह मामले : शालिनी माथुर, सुरक्षा की निदेशक
हमने लखनऊ में 1984 में महिलाओं के दहेज हत्या के खिलाफ मामलों को लड़ना शुरू किया, उस साल न कानून हमारे पास था, न पुलिस कुछ कर पाती थी। पूरे साल छह मामले आते थे। आज चीजें बदली हैं, हर रोज छह मामले आ रहे हैं, लेकिन हिंसा नहीं थम रही।

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अमर उजाला संवाद
 घरेलू हिंसा के खिलाफ सख्त कदम जरूरी : सदफ जफर, शिक्षाविद् और कार्यकर्ता
मैं खुद हिंसा या कहें घरेलू हिंसा की भुगतभोगी रही हूं। इसी वजह से मानती हूं कि औरतों को शक्ति से इसका विरोध करना चाहिए। साथ ही हमें फेमिनिज्म को सही परिभाषित करना होगा ताकि इसके जरिये समाज को सुधारे रखने का बीड़ा केवल महिलाओं के माथे ही न मढ़ा जाए।

खुद रिपोर्ट करें मामले : बेगम शहनाज, सामाजिक कार्यकर्ता
लड़कियां जब तक अपनी समस्याएं खुद रिपोर्ट नहीं करेंगी, हिंसा खत्म नहीं होगी। मेरा मानना है कि उन्हें आगे बढ़ना है तो दुख और हिंसा को सहते रहने की आदत छोड़नी होगी और आवाज बुलंद करनी होगी।
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अमर उजाला संवाद
आसपास छिपे भेड़ियों से सावधान करना होगा : वर्षा वर्मा, कवयित्री
अक्सर महिलाओं को कहा जाता है कि घर सुरक्षित हैं और बाहर भेड़िए हैं, लेकिन इसके उलट हमें घरों के आसपास और रिश्तेदारों व परिचितों में छिपे भेड़ियों के बारे में उन्हें सजग रखना होगा। सबसे बढ़कर खुद महिलाओं को खुद को कमजोर मानना छोड़ना होगा, अपनी शक्ति पहचाननी होगी।
सभी महिलाएं बनें एक-दूसरे की सहयोगी 

अंशु भटनागर, होममेकर 
कई दफा ऐसा भी देखने में आता है कि अगर कोई महिला अपने प्रति हो रहे अत्याचारों की आवाज उठाती है तो उसे कुछ महिलाएं ही नीचा दिखाने का प्रयास करती हैं। इसके बजाय, अगर उसे सपोर्ट किया जाए तो 50 प्रतिशत मामले और समस्याएं खुद-ब-खुद खत्म हो जाएंगी, विशेष रूप से महिला हिंसा की।
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अमर उजाला संवाद
परिवार से सपोर्ट मिलना चाहिए : अमिता अरुण, बिजनेस वीमेन
मैं खुद को खुशनसीब मानती हूं कि मुझे महिला होने के नाते वह सब नहीं सहना पड़ा, जिसके बारे में अक्सर दूसरी महिलाओं से सुनती रही हूं। इसकी वजह शायद अपने माता-पिता और सास-ससुर दोनों से मिला सपोर्ट है। अगर महिलाओं को घर से ऐसा सपोर्ट मिलेगा तो उनके लिए समस्याएं निश्चित तौर पर कम होंगी।

जागरूकता की कमी है : रेवा माथुर, सामाजिक कार्यकर्ता
दरअसल लड़के-लड़कियों में संवाद की कमी है। इसका परिणाम दोनों के बीच स्वस्थ संबंध विकसित न हो पाने के रूप में सामने आता है। दूसरी वजह जागरूकता की कमी है, जहां पीड़ित होने पर भी महिलाओं को समझ नहीं आता कि अपनी पीड़ा और व्यथा किसे बयान करें और समाधान कैसे निकालें।
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पितृ सत्तात्मक सोच से पैदा हो रही समस्याएं : ममता, वीमेन एक्टिविस्ट
हमारे समाज में यह सभी हिंसा और समस्याएं पितृ सत्तात्मक सोच से जन्म ले रही हैं। ‘औरत ही औरत की दुश्मन’ जैसी सोच भी उससे आती है, जिसमें मूल समस्या से ध्यान हटाकर सभी औरतों को नकारात्मक रूप से देखा जाने लगता है। मेरा मानना है कि इसका जवाब कानूनों के सही क्रियान्वयन में है।

कार्य स्थल पर भी करनी होगी बदलाव की शुरुआत : मुद्रा सिंह, सहायक व्याख्याता, विधि
परिवारों और घरों से बदलाव की शुरुआत हो चुकी है। लड़कियों को सुरक्षित माहौल देने पर बात हो रही है, लेकिन अब अगली कड़ी कार्य स्थलों पर लड़कियों को सुरक्षा देने की है। मुझे लगता है कि यहां जागरूकता बढ़ानी होगी और इसके लिए कामकाजी तबके को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी।

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अमर उजाला संवाद
भविष्य के मुकाबलों के लिए तैयार हों : शेफाली शर्मा, कराटे प्रशिक्षक
जब मैंने कराटे सीखना शुरू किया तो इस क्षेत्र में अधिकतर लड़के ही थे। उस समय अक्सर आत्मविश्वास डगमगाने वाली स्थितियां आती हैं, लेकिन मैंने महसूस किया कि आज अगर आत्मविश्वास खो दिया तो जीवन भर पछतावा रहेगा। आगे के मुकाबले के लिए हमें आज अपना आत्मविश्वास नहीं खोना चाहिए।
स्वावलंबन पर जोर दें 

मानसी, सामाजिक कार्यकर्ता
महिला हिंसा रोकने के लिए जरूरी है कि महिलाओं के स्वावलंबन पर जोर दिया जाए। इसकी शुरुआत शिक्षा से होती है, लेकिन आगे रोजगार परक प्रशिक्षण की जरूरत है। हमें ‘बेटी बचाओ’ और ‘बेटी पढ़ाओ’ के नारे से आगे बढ़कर बेटी को आत्मनिर्भर बनाने पर भी सोचना होगा।

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अमर उजाला संवाद
महिलाएं रिश्तों से परे भी कुछ हैं : संगीता, सामाजिक कार्यकर्ता
महिला हिंसा की एक बड़ी जड़ महिलाओं को इनसान के रूप में देखने के बजाय केवल रिश्तों तक सीमित रखने में है। इसकी वजह से उसकी भूमिकाएं भी बंध जाती हैं। वह एक सामान्य मनुष्य की तरह भी हो सकती है, यह सोच अभी लाने की जरूरत है।
 
घर से पनपी सोच भी वजह : मीना गुप्ता, मनोवैज्ञानिक
मैं मनोविज्ञान की दृष्टि से हिंसा की वजह सोचती हूं तो परिवारों से पनप रही सोच को इसके पीछे देखती हूं। कई बेटी-बेटे में अलग तरह का व्यवहार, बेटे के सामने उसकी मां को कमतर बताने जैसी चीजें लड़कों के मन में घर कर जाती हैं। वे हमेशा महिलाओं से उसी प्रकार व्यवहार करें तो हमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
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अमर उजाला संवाद
सक्षम महिलाएं हों मजबूत : डॉ. प्राची सिंह, बिजनेस वीमेन
मैं अक्सर देखती हूं कि समाज में अपने-अपने क्षेत्र में अथॉरिटी रखने वाली महिलाएं घरों में शोषित ही रह जाती हैं। अपने से जुड़े निर्णय लेने का भी उन्हें अधिकार नहीं मिलता। ऐसे में वे महिलाएं जो खुद को स्थापित नहीं कर सकी हैं, उनके साथ होने वाली हिंसा को रोकने के लिए अभी बहुत काम किया जाना है।

समाज को आगे आना होगा : ओम सिंह, मनोवैज्ञानिक 
फिलहाल मैं एक मामला देख रही हूं, जिसमें सबा नामक लड़की को उसका भाई संपत्ति के लिए मारना चाहता है। हालात ये हैं कि उस लड़की को लखनऊ में कहीं किराये पर घर भी नहीं मिल पा रहा है। सभी को अपनी जान का खतरा है। ऐसे हालात में हिंसा से सुरक्षा के लिए समाज को आगे आना होगा।

आजादी के मायने समझने होंगे : आफरीन, रेड ब्रिग्रेड कार्यकर्ता
लड़कियों की आजादी के मायने यह नहीं है कि उन्हें इसका दुरुपयोग करने की छूट मिले, बल्कि इसका सही उपयोग होना चाहिए ताकि गलत उदाहरण देकर भविष्य में इस प्रकार की आजादी को न रोका जाए, न ही महिला हिंसा के पीछे इसे वजह बताया जाए।
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