लखनऊ पुलिस का इतिहास कई रोमांचक किस्सों और जांबाजी से भरा हुआ है। यहां के अनेक पुलिस अफसर अपने काम से सुर्खियों में रहे और नागरिकों का विश्वास जीता। इस कॉलम में हम आपको ऐसे ही ‘अलग बात’ वाले वर्दी वालों से परिचित कराते हैं। इनमें ध्रुवकांत ठाकुर की अलग पहचान है। आला अफसरों या नेताओं की परिक्रमा के बजाय वह सुबह दस बजे से शाम पांच बजे तक दफ्तर में बैठकर शिकायतों की सुनवाई करते थे।
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- फोटो : डेमो
लखनऊ में डीआईजी/एसएसपी के पद पर 9 नवंबर 10 को तैनात हुए ध्रुवकांत ठाकुर ने न सिर्फ अपराध और कानून व्यवस्था पर काम किया, बल्कि नियमित रूप से दफ्तर में बैठकर बरसों से लंबित मामले निपटा डाले। आला अफसरों या नेताओं की परिक्रमा के बजाय उन्होंने दफ्तर में बैठकर लोगों की शिकायतों की सुनवाई पर पूरा ध्यान दिया।
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टालमटोल करने वाले थानेदारों को कसा और शिकायत लेकर अक्सर आने वाले लोगों को भी चिह्नित कर लिया। थानों पर नागरिकों की सुनवाई शुरू हुई और फर्जी शिकायत करने वालों का आना बंद हो गया। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के दफ्तर में फरियादियों की संख्या घटने लगी। ऐसा वक्त आया कि कक्ष का दरवाजा खोले बैठे कप्तान फाइलों के निस्तारण के साथ गैलरी में टकटकी लगाए रहते थे।
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आईपीएस ध्रुवकांत ठाकुर
- फोटो : amarujala
गेट पर नजर आए व्यक्ति को बुलाकर समस्या पूछते थे। फाइलों पर दस्तखत कराने के लिए पेशकार और बाबुओं को बस्ता बांधकर शिविर कार्यालय में देर रात तक कप्तान का इंतजार नहीं करना पड़ता था। ध्रुवकांत ठाकुर शाम पांच बजे तक दफ्तर में ही विभिन्न अनुभागों के लिपिकों को बुलाकर पत्रावलियों का निस्तारण करते थे।
छह थानों की सौगात
सवा साल से अधिक समय की कप्तानी में ध्रुवकांत ठाकुर ने राजधानी में छह नए थानों का प्रस्ताव तैयार किया और शासन में पैरवी करके पीजीआई, गौतमपल्ली, जानकीपुरम, पारा चौकी, विभूति खंड और इंदिरानगर थाने की स्थापना कराई। इसके अलावा एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट में थाने की तर्ज पर काम शुरू कराया।