फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

केजीएमयू के 115 साल का गौरवमयी इतिहास: दुनियाभर में बजता है जॉर्जियन का डंका, 1905 में हुई थी शुरुआत

Mon, 21 Dec 2020 06:27 PM IST
ishwar ashish चंद्रभान यादव, अमर उजाला, लखनऊ
विज्ञापन
1 of 5
- फोटो : amar ujala
किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी कई ऐतिहासिक घटनाओं का साक्षी है। 1905 से लेकर अब तक कई अहम बदलाव हुए हैं। संस्थान से अब तक निकले करीब 20 हजार डॉक्टरों ने दुनियाभर में केजीएमयू का नाम रोशन किया है। केजीएमयू से निकलने वाले प्रो. बलराम भार्गव आईसीएमआर के महानिदेशक हैं तो एसजीपीजीआई के निदेशक प्रो. राधाकृष्ण धीमान ने भी एमबीबीएस यहीं से किया है। इसी तरह दुनियाभर के चिकित्सा संस्थानों एवं कारपोरेट अस्पतालों का नेतृत्व भी यहां से निकलने वाले डॉक्टर कर रहे हैं।

1905 में शुरुआत: 1817 में महाराजा विजय नागरन ने लखनऊ में मेडिकल कॉलेज खोलने की जरूरत जाहिर की थी। उन्होंने इसके लिए तीन लाख रुपये दान किए। 26 दिसंबर 1905 को प्रिंस ऑफ वेल्स ने मेडिकल कॉलेज की शुरुआत की। भवन का शुभारंभ जॉर्ज पंचम और महारानी मैरी के भारत आने पर हुआ। उस समय सर जॉन प्रेसकॉट हेवेट यूपी के गवर्नर थे। शुरुआत में करीब 11 लाख रुपया खर्च हुआ था।
विज्ञापन

2 of 5
- फोटो : amar ujala
1911 में पहला बैच : एमबीबीएस का पहला बैच 31 छात्रों के साथ 1911 में शुरू हुआ। मुख्य भवन को पहले मच्छी भवन कहा जाता था। शुरुआत में यह संस्थान इलाहाबाद विवि से संबद्ध था। उसके बाद लखनऊ विवि से संबद्ध हुआ। पहले यहां 232 बेड का अस्पताल था। इस बीच यहां देश के साथ ही विदेश के छात्र भी शिक्षा ग्रहण करते रहे।

1949 में शुरू हुआ डेंटल कॉलेज: वर्ष 1949 में दूसरी फैकल्टी के रूप में डेंटल कॉलेज शुरू हुआ। पहले सत्र में 10 स्टूडेंट्स ने बीडीएस में एडमिशन लिया। इसके बाद 1956 में पैथोलॉजी सहित अन्य जांच सुविधाएं शुरू हुईं।

2002 में विश्वविद्यालय का दर्जा मिला: 16 सितंबर 2002 को इसे विश्वविद्यालय का दर्जा मिला। 2007 में तत्कालीन सरकार ने इसका नाम छत्रपति साहूजी महाराज चिकित्सा विश्वविद्यालय कर दिया, लेकिन पांच साल बाद सत्ता बदलते ही इसे पुराना नाम किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी मिल गया।
विज्ञापन

3 of 5
- फोटो : amar ujala
अब एशिया के सबसे बड़े चिकित्सा संस्थानों में शुमार
इस समय केजीएमयू में 282 पोस्ट ग्रेजुएट छात्र अध्ययनरत हैं। इसमें 47 सुपर स्पेशिएलिटी के हैं। ओपीडी में सामान्य दिनों में रोजाना करीब 10 हजार से अधिक मरीज देखे जाते हैं। इसी तरह और फैकल्टी ऑफ डेंटल साइंस के आठ विभाग हैं। इस साल से इंस्टीट्यूट के पैरामेडिकल साइंस के सात विभाग भी खुल रहे हैं। अब यहां 250 एमबीबीएस और बीडीएस की 100 सीटें हैं। यह चिकित्सा संस्थान अब 4500 बेड के साथ एशिया के सबसे बड़े चिकित्सा संस्थानों शामिल हो गया है।

4 of 5
सौ साल पूरे होने पर बना शताब्दी अस्पताल
विश्वविद्यालय के सौ साल पूरे होने पर 2005 में शताब्दी अस्पताल की स्थापना की गई। वर्ष 2009 में यह पूरा हुआ। इसे दो हिस्से में बांटा गया है शताब्दी फेज वन और शताब्दी फेज टू। शताब्दी फेज टू में ऑर्गन ट्रांसप्लांट विभाग स्थापित किया गया है। इसे जल्द ही चालू करने की तैयारी है। शताब्दी फेज 1 में लिवर ट्रांसप्लांट है। फेज 2 में 210 बेड और 50 आईसीयू बेड हैं।

एम्स बनने का इंतजार
पिछले दीक्षांत में तत्कालीन कुलपति ने केजीएमयू को एम्स का दर्जा देने की मांग की थी। समारोह में मौजूद कैबिनेट मंत्री एवं सांसद राजनाथ सिंह ने आश्वासन दिया था कि इसके तकनीकी पहलुओं की पड़ताल कराई जाएगी। यूनिवर्सिटी इस मुद्दे पर अभी तक इंतजार कर रही है।
विज्ञापन
विज्ञापन

5 of 5
प्रो. आरके धीमान व प्रो. अवतार सिंह वाखलू। - फोटो : amar ujala
एसजीपीजीआई के निदेशक प्रो. आरके धीमान का कहना है कि हमें केजीएमयू का छात्र होने पर गर्व है। 1984 बैच में एमबीबीएस की पढ़ाई के दौरान यहां के संकाय सदस्य एक-एक छात्र को नाम से जानते थे। कमजोर छात्रों की मदद को संकाय सदस्य हमेशा तैयार रहते थे। छात्रों के बीच प्रतिस्पर्धा तो रहती थी, लेकिन साथी के प्रति असहयोग नहीं दिखता था। इस प्रवृत्ति को बढ़ाने की जरूरत है।

पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग के डॉ. अवतार सिंह वाखलू का कहना है कि छात्रों का बुलंदी पर पहुंचना गुरु के लिए सबसे बड़ा तोहफा होता है। केजीएमयू में पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग की शुरुआत हुई तो हर कदम पर चुनौती थी। अब विभाग के पास सभी अत्याधुनिक सुविधाएं हो गई हैं। यहां से निकलने वाले पीडियाट्रिक सर्जन दुनियाभर में नाम कमा रहे हैं।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें