मेहनत से सजा ताना बाना
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मेहनत और कारीगरी
पैठणी की परम्परा राजा महाराजों के समय से जारी है। यूँ पुराने समय में इसमें खरे सोने के तारों की बुनाई बहुत की जाती थी, आज भी होती है लेकिन अब काफी वैरायटी में यह साड़ी बनाई जाने लगी है। एक अच्छी, छह, साढ़े छह मीटर की पैठनी के लिए करीब आधा किलो सिल्क के धागे और करीब ढाई सौ ग्राम जरी का उपयोग किया जाता है, जबकि पारम्परिक नौवारी महाराष्ट्रियन साड़ी में करीब एक किलो से अधिक सिल्क और जरी लग सकती है। आजकल सिल्क के साथ कॉटन व दूसरे फैब्रिक का उपयोग भी किया जाने लगा है। इन साड़ियों में आमतौर पर तोतों, मोर आदि पंछियों और फूलों की डिजाइन उकेरी जाती है और रंग चटख ही रखे जाते हैं। लेकिन इसके अलावा ऑर्डर के हिसाब से भी अलग डिजाइन और रंगों की साड़ियां बनाई जाती हैं। इनकी कीमत 3 हजार से कई लाख रूपये तक हो सकती है। खास ऑर्डर पर तैयार होने वाली साड़ियों की कीमत भी ख़ास होती है। एक साड़ी को बनाने में एक महीने से 1 साल तक का भी समय लग सकता है।