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क्या सच में मोहब्बत आपके दिमाग का केमिकल लोचा है?

Sun, 01 Mar 2020 04:18 PM IST
नवनीत राठौर लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
"मोहब्बत है क्या चीज, हम को बताओ? ये किसने शुरू की, हमें भी सुनाओ...." गीतकार संतोष आनंद ने फिल्म 'प्रेम रोग' में जब ये सवाल उठाया था, उससे पहले बहुत से नामवरों ने अपने-अपने तरीके से इस सवाल का जवाब देने की कोशिश की थी।

मसलन, अठारहवीं सदी के मशहूर शाइर मीर तकी मीर ने कहा, "इश्क इक 'मीर' भारी पत्थर है... कब ये तुझ ना-तवां से उठता है..." अगर, मीर ने इश्क को भारी पत्थर कहा, तो बीसवीं सदी के एक और शायर अकबर इलाहाबादी ने इसे कुछ ऐसे परिभाषित किया... "इश्क नाजुक मिजाज है बेहद, अक्ल का बोझ उठा नहीं सकता..."
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
क्या कहता है साइंस
और, जब साहिर ने संतोष आनंद के उठाए सवाल का जवाब देने के लिए कलम उठाई तो बहुत कुछ लिख डाला...

अल्लाह-ओ-रसूल का फरमान इश्क है
याने हफीज इश्क है, कुरआन इश्क है
गौतम का और मसीह का अरमान इश्क है
ये कायनात जिस्म है और जान इश्क है
इश्क सरमद, इश्क ही मंसूर है
इश्क मूसा, इश्क कोह-ए-नूर है।

किस्सा मुख्तसर ये कि जिसने जैसा महसूस किया, उसने इश्क-ओ-मोहब्बत को अपने तजुर्बात की बुनियाद पर बयां कर दिया। किसी को भारी पत्थर लगा, तो किसी को नाजुक मिजाज, किसी ने मोहब्बत में खुदा देखा, तो किसी को विलेन नजर आया। मगर साहब, ये बातें ठहरीं शायराना। इश्क के जज्बे को जब साइंसदानों के हवाले किया गया, तो बड़े नीरस तरीके से उन्होंने कह दिया-हुजूर ये आप के जहन का केमिकल लोचा भर है। ज्यादा लोड न लें, इसे लेकर।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
केमिकल लोचा है?
क्या वाकई, एहसास-ए-मोहब्बत कुछ केमिकल्स का खेल है? ऐसा है, तो पहली नजर का प्यार क्या है? इश्क में दुनिया को भुला बैठना क्या है? मोहब्बत का दीवानापन क्या है?

अगर, केमिकल लोचा होता, तो हम इश्क में गिरफ्तार न होते। मोहब्बत में दीवाने न होते। इसकी गलियों में दिल न खो बैठते। इश्क इतना आसां नहीं, जितना वैज्ञानिक कहते हैं। वरना कोई इंजेक्शन लगवाते और इश्क में मुब्तिला हो जाते। तभी तो हर जमाने के फलसफी चचा गालिब कह गए-

इश्क पर जोर नहीं है ये वो आतिश 'गालिब'
के लगाए न लगे और बुझाए न बुझे।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
साइंस के नजरिए से...
मोहब्बत होती है तो खुद से हो जाती है और न होनी हो तो लाख कोशिशें करते रहिए। छू कर भी न गुजरेगी आपको। रूमानी मोहब्बत की हकीकत ये है कि इक आग का दरिया है और डूब के जाना है। जो हो जाए तो ये हमारे काबू में नहीं रहती। बल्कि हम इसके काबू में होते हैं। इश्क इक ऐसा राज है, जैसे किसी जादूगर का इंद्रजाल। इक दफा फंस गए, तो क्या होगा, कैसे होगा कुछ अंदाजा नहीं होता। तो, इश्क के एहसास को सिर्फ साइंस के नजरिए से नहीं समझा जा सकता। इसकी रस्में हर सभ्यता, हर समाज हर संस्कृति में एक जैसी हैं। मगर बयान कुछ इस तरह से होती हैं-

इस इश्क-ओ-मोहब्बत की कुछ हैं अजीब रस्में
कभी जीने के वादे, कभी मरने की कसमें।

अब इस अजीब-ओ-गरीब रूहानी एहसास को साइंस के तजुर्बात क्या डिफाइन करेंगे? हम ऐसा क्यों कह रहे हैं, ये समझने के लिए विज्ञान की कुछ बातों पर गौर फरमाएं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
बॉन्डिंग हारमोन
अक्सर कहा जाता है कि सेक्स के हारमोन यानी फेरोमोन, तमाम जीवों में पाए जाने वाले वो केमिकल हैं, जो सामने वाले को ये संकेत देते हैं कि हमारे अंदर प्रजनन की कितनी खूबियां हैं। लेकिन, ये फेरोमोन कीड़ों में भले कारगर हों। मगर, दो इंसानों के बीच कनेक्शन में इनका रोल अस्पष्ट है। और अगर कोई केमिकल बाहर वाले को ऐसे संकेत दे सकता है, तो शरीर के भीतर भी तो असर करता होगा।

इस मामले में न्यूरोपेप्टाइड ऑक्सीटोसिन नाम का केमिकल प्यार का एहसास कराने में कारआमद साबित हो सकता है। क्योंकि इस बॉन्डिंग हारमोन कहा जाता है। जो दूसरों से जुड़ाव पैदा करता है। इससे महिलाओं में दूध का स्राव होता है और गर्भाशय का आकार घटाने-बढ़ाने में भी ये अहम रोल निभाता है। ऑक्सीटोसिन के बारे में काफी अध्ययन हुआ है। खास तौर से अमरीका के प्रेयरी के मैदानों में पाए जाने वाले चूहों पर। ये चूहे एक ही साथी के साथ जीवन बिताने यानी मोनोगैमी के लिए मशहूर हैं। जबकि आम तौर पर जानवरों में मोनोगैमी की गुंजाइश कम ही होती है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
प्यार का संदेश
इन चूहों पर हुए तजुर्बे में देखा गया कि इनमें ऑक्सीटोसिन का स्राव रोका गया, तो वो अपने जज्बातों को काबू में रखते थे। और जब इसकी तादाद बढ़ा दी गई, तो जो चूहे मोनोगैमी में यकीन नहीं रखते, वो भी एक ही साथी के ज्यादा करीब होते देखे गए। हालांकि, इंसानों में ऑक्सीटोसिन का इतना नाटकीय असर होता नहीं देखा गया। फिर कौन सा केमिकल है, जो हमारे अंदर प्यार का एहसास जगाता है। और अगर इंसान के शरीर से कोई केमिकल प्यार का संदेश लेकर निकलता है, तो उस संदेश को पढ़ने वाला केमिकल भी तो किसी के शरीर में निकलता होगा? जहन में इश्क की इस चिट्ठी का कोई लेटरबॉक्स तो होगा?

वैज्ञानिकों ने इस बारे में दिमाग पर रिसर्च की, तो ये देखा कि प्यार के एहसास से दिमाग के वही हिस्से जागृत होते हैं, जो कोई लक्ष्य हासिल करने या इनाम पाने के लिए काम करते हैं। ये भी देखा गया कि रूमानी एहसास और मातृत्व के प्यार के एहसास को हमारा दिमाग एक ही जगह से महसूस करता है। फिर, इश्क में दीवाना होने का एहसास कैसे आता है भला? सवाल बड़े हैं, और इनका जवाब पाने के लिए क्या हमें कुछ और प्रयोग करने पड़ेंगे? वैज्ञानिक इसका जवाब हां में ही देंगे।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
बड़ा पेचीदा मसला
मगर, मामला इतना आसान नहीं। प्यार बड़ा पेचीदा मसला है। गणित की कोई पहेली नहीं, जो कुछ खास फॉर्मूलों की मदद से सुलझा ली जाए। ये सोच समझ कर तो होता नहीं। स्वत: स्फूर्त होता है। तर्कों से परे होता है। तर्कशास्त्र के नियम इश्क पर लागू नहीं होते। फिर विज्ञान के प्रयोग कैसे ये पहेली सुलझा सकेंगे?

असल में हमारे अन्य एहसासों, तजुर्बों और बर्ताव की तरह मोहब्बत भी जहन की तमाम प्रक्रियाओं का निचोड़ है। जो बहुत पेचीदा है। लेकिन, ये कहना कि इश्क एक केमिकल लोचा है, इस पेचीदगी को बड़ा सादा बनाना होगा। कोई भला ये क्यों माने कि उसका इश्क सादा है। जो किस्मतवाले इस एहसास के झंझावात से गुजरे हैं, उन्हें इस शेर के साथ छोड़े जाते हैं-
क्या हकीकत कहूं कि क्या है इश्क
हक-शनासों के हां खुदा है इश्क
-मीर तकी मीर
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