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सेक्स वर्कर और उनके बच्चों के लिए परिवार जैसा कुछ होता है?

Tue, 04 Feb 2020 07:25 PM IST
नवनीत राठौर लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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relationship - फोटो : pixa
छोटी सी बच्ची की नोटबुक के एक पन्ने पर पेंसिल से बनी एक ड्रॉइंग है, जिसमें दो लड़कियां रो रही हैं और एक-दूसरे का हाथ थामे हुई हैं। कमाठीपुरा के स्थानीय नगरपालिका स्कूल की तीसरी क्लास में पढ़ने वालीं सायमा अब इन लड़कियों के गाल पर आंसू के तीन बूंद बना रही हैं और उन बूंदों को थोड़ा गहरा कर रही हैं।

लतिका बताती हैं, "इन्हें अपनी मां की कमी खल रही है।" इसके बाद सायमा फिर से पन्नों पर ड्रॉइंग बनाने में जुट जाती हैं। अब वह एक बर्थडे पार्टी का चित्रांकन कर रही हैं। एक बड़ा केक, मोमबत्ती, गिफ़्ट्स, पंखा और खुशी से चहकते बच्चों से भरा कमरा।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
एक दूसरी छोटी बच्ची भी अपनी नोटबुक खोलती है। उसमें दिल की ड्रॉइंग बनी हुई है, एक लाइन से वो इसे दो हिस्सों में बांट रही है। इन बच्चों ने अपनी नोटबुक में जो बनाया है, उसमें कोई घर नहीं है और न ही घर के बाहर कोई चारदीवारी है। उस शाम 50 के करीब बच्चे रात में चलने वाले शेल्टर में लौटकर आए हैं। यह शेल्टर मुंबई के बदनाम इलाके कमाठीपुरा में ग़ैर सरकारी संगठन प्रेरणा की ओर से चलाए जा रहे हैं। इस शेल्टर में सेक्स वर्करों के बच्चों को रात भर रखने की व्यवस्था है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
शेल्टर के कमरे पूरी तरह से सुसज्जित हैं। दीवारों पर क्रिसमस की सजावट दिख रही है। एक ब्लैक बोर्ड है और एक छोटा सा समुद्र तट भी बना हुआ है। दूसरी तरफ चटाई और बेडशीट्स रखी हुई हैं। एक छोटा सा टॉयलेट है। एक किचन भी है जहां इन बच्चों के लिए खाना बनाया जाता है। फिलहाल के लिए यह इन बच्चों का घर है।

वो अपने साथ स्कूल बैग और रात में बदलने के लिए कपड़े लेकर आए हैं लेकिन उनका बाकी सामान कहीं और है। उस गंदे से कमरे में, जहां उनकी मां रहती हैं। वे अपने इस घर में आते तो हैं लेकिन यहां बहुत देर नहीं रह पाते। जींस और धारीदार कमीज पहनी एक युवा मां गली के बाहर खड़ी हैं। उन्होंने लाल रंग की लिपस्टिक लगाई हुई है और खूब सारा मेकअप किया हुआ है।

करीब तीन साल का उनका बच्चा सेंटर में आते हुए रो रहा है। हालांकि वह पीछे मुड़कर अपनी मां को नहीं देखता, जिन्हें अपने काम पर लौटना है। पैसे के बदले पुरुषों के साथ सेक्स करने के काम पर।

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relationship - फोटो : pixa
कमाठीपुरा की गली नंबर नौ में बने सेंटर की सुपरवाइजर मुग्धा बताती हैं, "नया बच्चा है। उसे मालूम है कि उसे यहां आना है लेकिन रो रहा है। धीरे-धीरे अडजस्ट कर लेगा। सब बच्चे कर लेते हैं। इन परिवारों के पास कोई विकल्प नहीं होता।" देश के सबसे पुराने रेड लाइट इलाके के तौर पर पहचाने जाने वाले कमाठीपुरा में इन लोगों की ज्यादा कमाई भी नहीं होती लेकिन इलाके की पुनर्विकास योजनाओं के चलते किराया बढ़ गया है। अब बहुत ज्यादा कोठे भी नहीं रहे।

ऐसे में सेक्स वर्कर महिलाओं को मुश्किल हालात में रहना पड़ता है। छोटे कमरों में उन्हें किराए पर बेड लेना होता है। ऐसे कमरों में छह-छह बेड लगे होते हैं। नीचे वे खाना बनाते हैं और बेड के नीचे अपना सामान रखते हैं। यही वजह है कि बच्चों की ड्रॉइंग में घर की तस्वीर नहीं है। इन बच्चों का घर नहीं है। इन बच्चों की मांएं सेक्स वर्कर के तौर पर काम करती हैं लेकिन अपने बच्चों को स्कूल भेजती हैं ताकि उनके बच्चे इस दलदल से बाहर निकल सकें।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
इन परिवारों में मांएं हैं, उनके बच्चे हैं और बहुत हुआ तो वे एनजीओ वाले, जो इन बच्चों की देखरेख करते हैं। पिता का जिक्र नहीं होता है। सेक्स वर्कर हमेशा अपने दम पर जीने पर जोर देती हैं क्योंकि उनके हिसाब से सभी पुरुष दुर्व्यवहार, विश्वासघात और शोषण करते हैं। आईवीएफ से बच्चे पैदा करने वाली, गोद लेने वाली और तलाक या अलगाव के बाद अकेली रहने वाली मांएं भी सिंगल मदर होती हैं लेकिन इनकी तुलना में सेक्स वर्करों की काफी मुश्किल चुनौतियों से दो-चार होना होता है।
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relationship - फोटो : Pixabay
एक तो उन्हें रेड लाइट इलाके में रहना होता है। वहां के असुरक्षित वातावरण और घर के अभाव के साथ साथ उन्हें कलंक को झेलना होता है। दुनिया भर में सेक्स वर्करों को पैरेंट्स के तौर पर भेदभाव और कलंक का सामना करना होता है। सरकार और समाज के नैतिक दबाव के चलते कुछ देशों में उन्हें अपने बच्चों का हक भी छोड़ना होता है। अक्सर यह भी कहा जाता है कि सेक्स वर्कर अच्छे अभिभावक की भूमिका में फिट नहीं हो सकते। ऐसी धारणा बना दी गई है। इन धारणाओं के चलते उनके काम की कोई गरिमा नहीं है और सेक्स वर्करों को नैतिकता की बातें की जाती हैं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
मिताली (बदला हुआ नाम) बताती हैं कि उनके कमरे में केवल एक बेड है और बेड के नीचे की जगह है। पुरानी इमारत है जिसकी सीढ़ियां टूटी हुई हैं और दीवार भी जर्जर हैं। मिताली कमाठीपुरा में 15 साल पहले आईं थीं। पति की मौत के बाद वह पश्चिम बंगाल अपनी मां के घर गई थीं ताकि अपने दो बच्चों को पाल सकें लेकिन उनके माता-पिता बेहद गरीब थे।

मिताली बताती हैं, "वो इतने ग़रीब थे कि हमें खाने के लाले पड़ जाते थे।" वह कमाठीपुरा अपने एक परिचित के जरिए ही लाई गई थीं जिसने उन्हें भरोसा दिया था कि उन्हें घर पर झाड़ू-पोछा करने का काम मिल जाएगा। लेकिन औरों की तरह वह रेड लाइट एरिया में पहुंच गईं। फिर वह अपने गांव से बेटी और बेटे को भी ले आईं और उनका दाखिला विभिन्न गैर सरकारी सेंटरों के डे केयर सेंटर और नगर पालिका स्कूल की तीसरी मंजिल पर चल रहे नाइट केयर सेंटर में करा दिया। बच्चे अपनी मां के पास दो बार जा पाते हैं- पहली बार सुबह में, नाइट शेल्टर में नहा धोकर और ब्रेकफास्ट करने के बाद स्कूल जाने के दौरान।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
मिताली पांच बजे सुबह जग जाती हैं और अपने बेटे के लिए टिफिन तैयार करती हैं। बेटा 12 साल का हो चुका है और एक स्कूल में पढ़ता है। इसके बाद मिताली सो जाती हैं और फिर दोपहर में जगकर बेटे के लिए खाना बनाती हैं जो चार बजे के करीब लौटता है और खाना खाकर नाइट शेल्टर चला जाता है। इसके बाद मिताली अपने काम के लिए तैयार होती हैं। वह बताती हैं, "मैं अपने बेटे के लिए जो कर सकती हूं, वह सब कर रही हूं। मैं भी मां हूं और अपने बच्चे को सबसे बेहतर सुविधाएं देना चाहती हूं।" लेकिन रेडलाइट इलाके़ की अपनी मुश्किल है। बच्चों को पहले लगता है कि किसी और बच्चे की तरह ही उनकी मां कामकाजी हैं। बाद में उन्हें मां के काम के बारे में पता चलता है लेकिन यह स्थिति बदली नहीं जा सकती।

मिताली का कहना है कि घर के तौर पर बस यही है हमारे पास और मेरे बच्चे ही मेरा परिवार हैं। पहले जब कमाठीपुरा और फॉकलैंड रोड पर नाइट शेल्टर नहीं होते थे तब ये मांएं अपने अपने बच्चों को बेड या अलमारी के पीछे छुपाती थीं या फिर उन्हें सीढ़ियों पर भेजती थीं ताकि उन्हें उनके काम के बारे में पता नहीं चले।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
मिताली की बेटी भी इस इलाके में कुछ साल रही और उसके बाद उसके नाना-नानी ले गए। उसकी शादी हो चुकी है। मिताली के मुताबिक। यहां बच्ची को रखना बेहद मुश्किल था। अब साल में एक बार मिताली अपने गांव जाती हैं और अपनी बेटी से मिलती है जबकि बेटा उनके साथ ही रहता है।

मिताली बताती हैं, "मेरे पास बस छोटा सा बेड है लेकिन यह मेरे लिए घर जैसा ही है। लोगों को फुटपाथ पर रहना पड़ता है। ऐसे में यह घर तो है। हम इसलिए इसे घर कहते हैं। मेरे बेटे को मालूम है कि उसे दिन और रात शेल्टर में बिताने हैं लेकिन वो यह भी जानता है कि मैं उसका घर हूं।"

मिताली जब ये सब बताती हैं तो उनकी आवाज में उदासी साफ दिखती है। पहले तो थोड़ा संभल-संभलकर बोलती हैं क्योंकि वर्षों के विश्वासघात ने उन्हें हर बात के उद्देश्य को लेकर संदेह करना सिखा दिया है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
हालांकि, बाद में वो अपनी निराशा, अकेलेपन और हताशा के बारे में बात करती हैं। यह वैसी कहानी है जो यहां हर किसी की है और हर कोई अपनी बात जोड़ता चला जाता है। ये लोग ऐसी जगह रहते हैं जहां उनके मां होने पर सवाल उठने लगते हैं। किसी दिन वो अपने बेटे को चौपाटी ले जाती हैं। बेटे के जन्मदिन के लिए वह पैसे जमा करती हैं ताकि उसे नए कपड़े दिला सकें, केक खरीद सकें और कुछ पॉकेट मनी भी दे सकें।

मिताली बताती हैं, "हम बर्थडे पार्टी तो नहीं मनाते लेकिन इतना कुछ कर लेती हूं। मेरा अपना जीवन तो तबाह हो चुका है लेकिन मैं चाहती हूं कि बेटे को नौकरी मिल जाए और अपने दम पर मिले।" उन्हें दूसरी सेक्स वर्करों की तरह ही कोठे पर 'पिंजरा' किराए पर लेना होता है। एक बार इस्तेमाल के लिए 20 रुपये चुकाने होते हैं। कमाठीपुरा में पर्दे लगे बेड को पिंजरा कहते हैं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
मिताली बताती हैं कि उनके कमरे वाले बेड पर कोई आना नहीं चाहता, इसलिए उन्हें पिंजरा किराए पर लेना होता है। बहुत सी महिलाएं अलग अलग वजहों से अकेली रहती हैं, जिसमें सही पार्टनर का नहीं मिल पाना, स्वतंत्रता के लिए, अपनी इच्छा के लिए या फिर विवाह में मिलने वाले तिरस्कार से बचना, जैसी वजहें शामिल हैं। इनके उलट सेक्स वर्करों से जुड़े आंकड़ों के मुताबिक, वे मानती हैं कि पुरुष उनका शोषण और तिरस्कार करते हैं। इन वजहों से वे अकेले रहना पसंद करती हैं।

सच्चाई ये है कि सेक्स वर्करों के बच्चों को स्कूलों और समाज में काफी भेदभाव का सामना करना पड़ता है, क्योंकि सेक्स वर्करों के कामकाज को लेकर समाज में मनमाने ढंग से फैसले लिए जाते हैं।
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