Stress Woman
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दबाव की सीमा
अति किसी भी चीज की बुरी होती है। सामाजिक नियमों को पूरी तरह नकार देना या अपनी खुशियों को त्याग कर सामाजिक दबाव के भय में जीना, दोनों ही अति हैं और गलत हैं। इसलिए संयम के साथ संतुलित मार्ग पर चलें। अब सवाल है कि सामाजिक दबाव की सीमा कौन निर्धारित करेगा? इसके लिए व्यक्ति को स्वविवेक से तय करना चाहिए कि उसके लिए क्या जरूरी है और किन बातों की परवाह उसे नहीं करनी चाहिए।
मन का विश्वास कम न हो
समाजशास्त्री डॉ. ऋतु सारस्वत बताती हैं, हम सब सामाजिक प्राणी हैं और समाज से पूरी तरह कट कर नहीं रह सकते। ऐसे में सामाजिक दबाव को पूरी तरह अस्वीकारना असंभव है। अक्सर ही अत्यधिक सामाजिक दबाव में जीने वाले व्यक्ति का मन कुंठित हो जाता है, जिससे उसे चिंता, तनाव और अवसाद जैसी मनोवैज्ञानिक समस्याएं उत्पन्न होने लगती हैं। साथ ही उनका आत्मविश्वास कमजोर होता है और उन्हें हमेशा सामाजिक स्वीकृति की जरूरत महसूस होती है। ऐसे व्यक्तियों को अक्सर सामाजिक दबाव अधिक महसूस होता है। इसके विपरीत जो लोग आत्मविश्वासी होते हैं, वे सही-गलत की पहचान करके अपने लिए स्वयं उचित निर्णय लेते हैं। ध्यान रखें, व्यक्ति से ही समाज बनता है, इसलिए अपनी प्राथमिकताओं को पहचान कर बिना किसी दबाव के निर्णय लें।