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CoronaVirus: एक नहीं बल्कि कई मुद्दों पर WHO ने बदला रुख, आलोचना और आरोपों के बीच कब-कब लिया यू-टर्न?

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Coronavirus, WHO - फोटो : Amar Ujala
कोरोना वायरस के बारे में प्राथमिक सूचनाएं जारी करने से लेकर विभिन्न विषयों पर बार-बार अपनी राय बदलने के कारण विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) को दुनियाभर से आलोचना झेलनी पड़ रही है। एसिम्प्टोमैटिक यानी बिना लक्षण वाले मरीजों से संक्रमण फैलने की बात हो, अमेरिका की ओर से चीन के सुर में सुर मिलाने के आरोप हों या फिर हवा में कोरोना संक्रमण के फैलने की बात हो... विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कई मौकों पर अपने ही बयानों से पलटी मारी है। इन वजहों से संयुक्त राष्ट्र की इस शीर्ष स्वास्थ्य संस्था की साख पर भी असर पड़ा है। आइए जानते हैं किन-किन मुद्दों पर और कब-कब डब्ल्यूएचओ ने बयानबाजी की और फिर यू-टर्न ले लिया। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
22 मई: भारतीय दवा के खिलाफ चीन की रिसर्च
  • 22 मई को कोरोना के इलाज में मददगार साबित होने वाली भारतीय दवा हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन के खिलाफ चीन की स्वास्थ्य पत्रिका लैंसेट ने गलत रिसर्च प्रकाशित कर दी थी। रिसर्च में कोरोना मरीजों पर हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन दवा से गंभीर खतरे की बात कही गई थी। इसी आधार पर विश्व स्वास्थ्य संगठन(WHO) ने भी कोरोना मरीजों पर इसके प्रायोगिक इस्तेमाल पर रोक लगा दी थी। 
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Hydroxychloroquine Tablet - फोटो : Social Media
05 जून: रिसर्च स्टडी वापस, WHO की आलोचना 
  • WHO की रोक के बावजूद भारत, ब्राजील, अमेरिका समेत कई देशों में इसका प्रयोग होता रहा। दुनियाभर के कई देशों के वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं की आपत्ति पर लैंसेट को रिसर्च स्टडी वापस लेनी पड़ी। सोशल मीडिया पर इसे चीन की साजिश भी बताई गई और केवल एक स्टडी के आधार पर WHO के फैसले की खूब आलोचना हुई। 

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कोरोना वायरस की जांच (फाइल फोटो) - फोटो : iStock
एसिम्प्टोमैटिक मरीजों पर बार-बार अलग बयान
  • 08 जून: एसिम्प्टोमैटिक मरीज नहीं फैलाते संक्रमण
डब्ल्यूएचओ का कहना था कि बिना लक्षण वाले मरीज से कोरोना वायरस नहीं फैलता। आठ जून को WHO की महामारी विशेषज्ञ डॉ. मारिया वेन ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा था कि एसिम्प्टोमैटिक यानी बिना लक्षण वाले मरीजों से भी संक्रमण फैल सकता है, लेकिन दुनिया में जिस तरह मामले बढ़ रहे हैं उसकी वजह ये मरीज नहीं हैं। 
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WHO Guidelines about Coronavirus - फोटो : Amar Ujala
09 जून: गलतफहमी बता कर दी सफाई 
  • डॉ. मारिया वेन नौ जून को कहा कि मैंने 'बेहद दुर्लभ' शब्द का इस्तेमाल किया, वह एक गलतफहमी थी। अभी हमारे पास इसका कोई जवाब नहीं है। मैं उस वक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवालों का जवाब दे रही थी। एक सवाल के जवाब में मैंने वो बात कही थी। मैं वह बताने की कोशिश कर रही थी जो समझ पा रही थी। मैंने ऐसा हाल रिसर्च के आधार पर बयान दिया था।
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WHO Chief - फोटो : Twitter
10 जून: डब्ल्यूएचओ प्रमुख ने संभाली बात 
  • डब्ल्यूएचओ प्रमुख जनरल टेड्रोस अधानोम ने इस पूरे मामले पर जवाब देते हुए कहा, अभी इस मामले पर और रिसर्च की जाने की जरूरत है। क्योंकि कोविड-19 का वायरस नया है। संगठन हर समय इससे कुछ न कुछ सीख रहा है। वायरस से जुड़ी जटिल चीजों को समझना उतना आसान नहीं है लेकिन यह हमारी ड्यूटी है और हम हमेशा बेहतर कर सकते हैं।
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न्यूजीलैंड में कोरोना की जांच के लिए नमूना एकत्र करती स्वास्थ्य कर्मी(File Photo) - फोटो : PTI
  • लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन के महामारी रोग विशेषज्ञ प्रो. लियाम स्मिथ के मुताबिक, विज्ञान को लेकर यह बात मेरी समझ के विपरीत है। ऐसे मरीज जिनमें लक्षण नहीं दिखते उनसे भी दूसरों में संक्रमण फैल सकता है। इसलिए लोगों को सावधान रहने की जरूरत है। 

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Wuhan lab(File Photo) - फोटो : social media
कोरोना फैलने की प्रारंभिक सूचना
  • बीते साल 2019 के दिसंबर में चीन के वुहान से कोरोना का पहला मामला सामने आया था। चीन स्थित WHO के कार्यालय ने अज्ञात कारणों से वायरल निमोनिया की जानकारी दी थी। खबरों के मुताबिक, इस बारे में डब्ल्यूएचओ ने चीन से दो बार पूछा तो उसने तीन जनवरी को जवाब दिया था। शुरुआत में WHO ने जहां चीन से सूचना आने की बात कही, वहीं लगातार आलोचनाओं का शिकार होने के बाद वह अपने बयान से पलट गया।

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WHO, Donald Trump, Xi Jinping - फोटो : Social Media
चार जुलाई को बयान से पलटा डब्ल्यूएचओ
  • अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आरोप लगाया था कि संयुक्त राष्ट्र की संस्था डब्ल्यूएचओ(WHO) महामारी की सूचनाओं को मुहैया कराने में असफल रही और चीन को खुश करने में लगी रही, जिससे डब्ल्यूएचओ ने इनकार किया। बीते चार जुलाई को डब्ल्यूएचओ ने कहा कि वुहान में निमोनिया जैसे मामलों के बारे में सबसे पहले चीन में उसके ऑफिस ने सूचना दी थी न कि खुद चीन ने। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
हवा में संक्रमण फैलने की बात
  • कोरोना संक्रमण के फैलने को लेकर डब्ल्यूएचओ का शुरुआत से यही कहना था कि यह व्यक्ति से व्यक्ति में फैलता है। संक्रमित मरीज के ड्रॉपलेट्स के जरिए यह फैलता है। जून के दूसरे हफ्ते में 'पीएनएस' जर्नल में प्रकाशित अध्ययन में इसे 'हवा में फैलने वाली बीमारी' बताया गया तो कई वैज्ञानिकों ने आपत्ति जताते हुए इसे वापस लेने की मांग कर दी। हालांकि कुछ ही हफ्ते बाद एक नई रिसर्च स्टडी आई, जिसने डब्ल्यूएचओ को भी अपनी राय बदलने पर मजबूर कर दिया।

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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Pixabay
जुलाई में डब्ल्यूएचओ ने माना- कोरोना हवा में भी फैलता है
  • फिर जुलाई में क्लीनिकल इंफेक्शियस डिजीज जर्नल में सोमवार को प्रकाशित हुए एक खुले खत में, 32 देशों के 239 वैज्ञानिकों ने इस बात के प्रमाण दिए थे कि कोरोना वायरस एक ‘फ्लोटिंग वायरस’ है जो हवा में ठहर सकता है और सांस लेने पर लोगों को संक्रमित कर सकता है। इसके बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन को यह बात माननी पड़ी थी कि कोरोना वायरस का संक्रमण हवा में भी फैल सकता है। डब्ल्यूएचओ ने स्वीकार किया कि सार्वजनिक जगहों पर, खासकर भीड़भाड़ वाली, कम हवा वाली और बंद जगहों पर हवा के जरिए वायरस फैलने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। 

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चीन के वुहान से फैला था कोरोना वायरस(File Photo) - फोटो : PTI
  • पिछले महीने विश्व स्वास्थ्य संगठन के विशेषज्ञ चीन के दौरे पर गए थे, कोरोना वायरस की उत्पत्ति के बारे में पता करने। हाल ही में विशेषज्ञों को दो हफ्ते का चीन का प्रवास खत्म हुआ है। खबरों के मुताबिक, डब्ल्यूएचओ अब चीन के साथ मिलकर कोरोना वायरस के फैलने की मूल जगह और वजहों की पड़ताल करेंगे। हालांकि यह जांच कब शुरू होगी, इस बारे में स्थिति स्पष्ट नहीं है।
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विश्व स्वास्थ्य संगठन - फोटो : Social media
  • अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप 'डब्ल्यूएचओ' पर चीन की तरफदारी का आरोप लगाते रहे हैं। अमेरिका ने संगठन से खुद को अलग भी कर लिया है। हालांकि डब्ल्यूएचओ शुरुआत से ही अमेरिका के आरोपों से इनकार करता आ रहा है। लेकिन विशेषज्ञों की मानें तो कई बिंदुओं पर रुख बदलने के कारण डब्ल्यूएचओ की साख पर भी सवाल उठे हैं। हालांकि विश्व स्वास्थ्य संगठन इस महामारी की स्थिति में तमाम संभव सकारात्मक प्रयासों में लगा हुआ है। 
     
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