डॉ सत्यकांत त्रिवेदी
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''हमें डॉक्टर्स को, और डॉक्टर्स को खुद को भगवान मानना छोड़ना होगा''
''डॉक्टर भी इंसान ही हैं, भगवान नहीं। वह बस मरीजों को सबसे उचित इलाज देने की अपनी पूरी कोशिश भर कर सकते हैं, जो हर डॉक्टर करते भी हैं''- वरिष्ठ मनोरोग विशेषज्ञ डॉ सत्यकांत त्रिवेदी ने इस बात पर विशेष जोर दिया।
वह कहते हैं- इलाज के दौरान हमें जीत भी मिलती है और हार भी, कई बार ना बचने की उम्मीद से अस्पताल में भर्ती मरीज की जान बच जाती है और कुछ लोगों को लाख को कोशिशों के बाद भी नहीं बचाया जा पाता। इंसान हैं, तो यह दोनों स्थितियां संभव हैं। यह डॉक्टर्स को खुद को और मरीज-परिजनों को भी समझना चाहिए''।
डॉ सत्यकांत कहते हैं, कई चीजें हैं जिसे बदलने की विशेष आवश्यकता है, जैसे हम डॉक्टर्स को एक तरफ तो भगवान मानते हैं और दूसरी तरफ 'रिटर्न ऑन इनवेसमेंट' चाहते हैं। मतलब अगर आप महंगे अस्पताल में इलाज कराने गए हैं तो पहले ही मान लिया जाता है कि हम ज्यादा पैसा खर्च कर रहे हैं तो मरीज को ठीक होना ही चाहिए। पर क्या वास्तव में ऐसा हो सकता है? क्या अधिक पैसा जान बचाने की गारंटी है?
गूगल और सस्ते इंटरनेट के इस दौर में मरीजों का वर्ग भी बदला है। मुख्यत: तीन तरह के लोग इलाज के लिए आ रहे हैं। पहले जो इलाज कराने आते हैं, दूसरा- रोगी ने जो खुद से रोग के बारे में समझा है वह उसकी पुष्टि चाहते हैं और तीसरे वे जो यहां तक कहते हैं कि मुझे ये बीमारी है, इसमें ये टेस्ट और ये दवाइयां लिख दीजिए। मसलन हम डॉक्टरों के प्रति एक अजीब तरह के विश्वास और अविश्वास के दौर से गुजर रहे हैं। डॉक्टरों में बढ़ती मानसिक समस्याओं का एक कारण उनसे मरीजों की अतिशय आशा को, कुछ स्थितियों में अविश्वास को भी माना जा सकता है।
डॉक्टर्स सॉफ्ट टारगेट भी हैं, कभी किसी डॉक्टर को पीट दिया, किसी को धमकी दे दी, किसी को आत्महत्या पर विवश कर दिया। क्या हम सड़क टूटने के कारण होने वाली दुर्घटना के लिए ठेकेदार को जिम्मेदार मानते हुए भी उसके साथ ऐसा करते हैं?- नहीं। डॉक्टर्स को भी यह समझना होगा कि उनकी भी एक सीमा है, वह ब्रह्मा नहीं हैं, जो नियति बदल दें। वैसे नियति तो बदलते ब्रह्मदेव भी नहीं थे, उपाय निकाल देते थे बस।